सिंगरौली बिजली समझौता 25 साल, 1.25 लाख करोड़ और भाजपा-अडानी की 'जुगलबंदी'
भारतीय जनता पार्टी की सरकार चाहे केंद्र में हो या मध्य प्रदेश में, उनका मकसद एक ही है कि उद्योगपति गौतम अडानी की तिजोरी भरना। फिर इस काम में जनता का कितना नुकसान हो रहा हो, इसका बिल्कुल ध्यान नहीं रखा जाता। प्रदेश में एक बार फिर 'विकास' के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई से उद्योगपतियों की तिजोरी में भरने का खेल शुरू हो गया। इस खेल का नया केंद्र बना है ऊर्जा धानी इलाका सिंगरौली। यहां परदे के पीछे ऐसा बिजली खरीद समझौता (पीपीए) होने वाला है, जिसे मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार जनता से छुपाने की कोशिश कर रही है। इस समझौते को समझने वालों ने दावा किया कि अगले 25 साल में जनता की जेब से 1.25 लाख करोड़ रुपए निकालकर सीधे अडानी ग्रुप के हवाले करने का पूरा खाका तैयार कर लिया गया। यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता के पैसों की संभवतः सबसे बड़ी संगठित लूट है! सवाल उठता है कि अगर यह समझौता प्रदेश के हित में है, तो इसे सार्वजनिक करने से पहले शिवराज सिंह और अब डॉ मोहन सरकार कतरा क्यों रही है? जो सरकार छोटी-छोटी योजनाओं का ढोल पीटती है, वह इतने बड़े समझौते पर मौन क्यों है? नागरिक संगठनों के दावों के मुताबिक, सिंगरौली (महान एनर्जेन लिमिटेड) और प्रदेश के अन्य हिस्सों से अडानी ग्रुप से जिस दर पर बिजली खरीदने का अनुबंध किया जा रहा, वह अब तक की सबसे महंगी दरों में से एक है। एक तरफ देश और दुनिया में सोलर और रिन्यूएबल एनर्जी (अक्षय ऊर्जा) की दरें 2.50 रुपये प्रति यूनिट के आसपास सिमट रही हैं, वहीं भाजपा सरकार अडानी के कोयला संयत्रों से करीब दोगुनी और भारी-भरकम दरों पर 25 साल का लंबा दांव खेल रही है। मध्य प्रदेश के पास पहले से ही अपनी जरूरत से ज्यादा (सरप्लस) बिजली उत्पादन की क्षमता मौजूद है। जब प्रदेश के सरकारी बिजली कारखाने बंद पड़े हैं या अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं, तो फिर अडानी ग्रुप से इतनी महंगी बिजली खरीदने की क्या मजबूरी थी? ये भी सच है कि मध्य प्रदेश दूसरे राज्यों को बिजली बेच रहा है, तो फिर इस खरीद समझौते का सच क्या है? होने वाले इस समझौते की सबसे आपत्तिजनक शर्त 'फिक्स चार्ज' यानी नियत प्रभार की है। घोर आपत्ति वाली बात तो यह कि यदि मध्य प्रदेश सरकार अडानी के प्लांट से एक यूनिट बिजली नहीं खरीदे, तब भी उसे करार के मुताबिक हजारों करोड़ रुपए हर साल अडानी ग्रुप को 'सिटिंग फीस' या फिक्स चार्ज के रूप में देने ही होंगे। यह पैसा न तो मुख्यमंत्री अपनी जेब से देंगे और न उनके मंत्री! यह सीधे मध्य प्रदेश के किसान, मजदूर और मध्यमवर्ग के बिजली बिलों में 'फ्यूल सरचार्ज' और 'अतिरिक्त कर' के नाम पर वसूला जाएगा। सिंगरौली के धिरौली ब्लॉक में कोयला खदान की मंजूरी से लेकर पावर प्लांट के विस्तार तक, हर रास्ता अडानी ग्रुप के लिए पलकें बिछाकर आसान किया गया। नियम-कायदे ताक पर रखकर जनसुनवाई के नाम पर औपचारिकताएं पूरी की गईं। क्रोनोलॉजी साफ है खदान अडानी की, कोयला अडानी का, बिजली का कारखाना अडानी का और मुनाफा भी अडानी का। मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार यहां केवल एक एजेंट की भूमिका में दिख रही है, जिसका काम जनता से टैक्स वसूलना और कॉरपोरेट मित्रों की तिजोरी भरना रह गया है। दुखद सच्चाई यह है कि आने वाले 25 साल तक मध्य प्रदेश की आने वाली पीढ़ियां भी इस 'महंगी बिजली' के कर्ज तले दबी रहेंगी। जब हर घर का बजट बिजली के बिल के कारण बिगड़ रहा हो, तब 1.25 लाख करोड़ रुपए का यह समझौता भाजपा की 'अंत्योदय' की नीति पर सबसे बड़ा तमाचा है। अब समय आ गया है कि प्रदेश की जनता इस गुप्त समझौते पर सरकार से श्वेत पत्र की मांग करे। अगर सरकार बेदाग है, तो समझौते की एक-एक शर्त को जनता के सामने रखे, वरना यह साफ है कि 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा सिर्फ छलावा था असली सच तो 'अडानी का साथ, अडानी का विकास' है।/