आदिवासी कोड से भाजपा को डर क्यों लग रहा, पहचान मिटाने वालों से विधानसभा में हिसाब मांगूंगा!
भाजपा से सीधा सवाल: आदिवासी कोड से डर क्यों?
मैं आज भारतीय जनता पार्टी की सरकार से एक सीधा सवाल पूछना चाहता हूं कि आखिर आपको आदिवासी कोड से डर क्यों लगता है? यह सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं है। यह सवाल मध्यप्रदेश के करोड़ों आदिवासियों का है। यह सवाल उस समाज का है, जिसकी संस्कृति हजारों साल पुरानी है, जिसकी परंपराएं जंगल, पहाड़, नदी और प्रकृति से जुड़ी हैं और जिसने इस देश की धरती, जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए पीढ़ियों तक संघर्ष किया है।
पहचान मांगना राजनीति है या पहचान छीनना?
भाजपा वाले कहते हैं कि आदिवासी कोड की मांग राजनीति है। मैं पूछना चाहता हूं अपनी पहचान मांगना राजनीति है या पहचान छीनना राजनीति है? अगर आदिवासी समाज कहता है कि हमारी अपनी संस्कृति है, हमारी अपनी आस्था है, हमारे अपने रीति-रिवाज हैं और हमें जनगणना में अपनी अलग पहचान के साथ दर्ज किया जाए, तो इसमें गलत क्या है? आजादी से पहले आदिवासियों के लिए अलग पहचान और जनगणना की व्यवस्था रही है। 1951 तक अलग कोड का उल्लेख संसदीय रिकॉर्ड में भी मिलता है। फिर आज सवाल उठता है कि जब उस समय आदिवासी की पहचान दर्ज हो सकती थी तो आज क्यों नहीं?
दिखावे का सम्मान, असली पहचान से परहेज
मैं भाजपा सरकार से पूछता हूं कि क्या आज आदिवासी समाज पहले से कम महत्वपूर्ण हो गया? आप आदिवासी गौरव दिवस मनाते हैं। आदिवासी महापुरुषों के नाम पर कार्यक्रम करते हैं। मंच से भगवान बिरसा मुंडा का नाम लेते हैं। आदिवासी वोट लेने के लिए बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन, जब आदिवासी अपनी असली पहचान की बात करता है तो आपको संविधान याद आने लगता है! यह कैसी राजनीति है?
पहचान सदियों पुरानी, किसी दल की मोहताज नहीं
मैं साफ कहना चाहता हूं कि हम किसी दूसरे धर्म की आस्था के खिलाफ नहीं हैं। हम किसी की पहचान छीनना नहीं चाहते। लेकिन, आदिवासी की अपनी पहचान को किसी दूसरी श्रेणी में समेट देने की कोशिश का विरोध जरूर करेंगे। आदिवासी समाज कोई ऐसा समुदाय नहीं है, जिसकी पहचान चुनाव के समय बनाई जाए। उसकी पहचान सदियों से मौजूद है। उसकी संस्कृति किसी राजनीतिक दल की मोहताज नहीं है। उसकी आस्था किसी सरकार की देन नहीं है।
मेरा सवाल भाजपा से है कि अगर जैन समाज जैसे समुदाय की अलग धार्मिक पहचान पर चर्चा हो सकती है, तो साढ़े 12 करोड़ आदिवासियों की अलग पहचान पर चर्चा क्यों नहीं हो सकती? अगर सरकार अलग-अलग समुदायों की पहचान को सम्मान दे सकती है, तो आदिवासी समाज के मामले में उसके हाथ क्यों कांपते हैं? भाजपा को इसका जवाब देना होगा।
आदिवासी कोड से क्या खतरा है?
क्या आदिवासी समाज को अलग कोड देने से हिंदू धर्म खत्म हो जाएगा? क्या किसी की पूजा-पद्धति छिन जाएगी? क्या किसी की आस्था पर प्रतिबंध लग जाएगा? नहीं! फिर इतना विरोध क्यों? सच्चाई यह है कि आदिवासी अपनी पहचान के साथ खड़ा होना चाहता है और भाजपा सरकार इस सवाल से बचना चाहती है।
सदन से सड़क तक आवाज उठाऊंगा
मैं यह सवाल बार-बार उठाऊंगा। सरकार से जवाब मांगूंगा। सदन में आवाज उठाऊंगा और सड़क पर भी आदिवासी समाज के साथ खड़ा रहूंगा। यह सिर्फ धर्म कोड का सवाल नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का सवाल है। जनगणना में जिस पहचान को दर्ज नहीं किया जाएगा, आने वाले समय में इतिहास के दस्तावेजों में वह पहचान कमजोर होती जाएगी।
मैं भाजपा सरकार को चेतावनी नहीं, चुनौती देता हूं — आदिवासी की पहचान के सवाल पर राजनीति मत कीजिए। अगर आप सच में आदिवासी समाज का सम्मान करते हैं तो आदिवासी कोड की मांग पर स्पष्ट निर्णय लीजिए।
आदिवासी अस्मिता की लड़ाई
आदिवासियों को अपना नाम चाहिए, अपनी पहचान चाहिए, अपनी संस्कृति की मान्यता चाहिए और अपने इतिहास का सम्मान चाहिए। और मैं यह लड़ाई किसी पद के लिए नहीं लड़ रहा हूं। मैं यह लड़ाई जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अस्मिता के लिए लड़ रहा हूं।
भाजपा को याद रखना चाहिए — आदिवासी की पहचान किसी सरकार की कृपा से नहीं बनी है। यह पहचान हजारों साल की विरासत है। सरकार चाहे जितनी कोशिश कर ले, आदिवासी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। अब आदिवासी समाज सवाल पूछ रहा है कि जब हमारी पहचान हजारों साल से अलग है, तो जनगणना में उसे अलग दर्ज करने में भाजपा सरकार को परेशानी क्यों है? इस सवाल का जवाब भाजपा को देना पड़ेगा। और जब तक जवाब नहीं मिलेगा, मैं विधानसभा से लेकर सड़क तक यह आवाज उठाता रहूंगा।
आदिवासियों की पहचान मिटाने नहीं देंगे। आदिवासियों की संस्कृति दबाने नहीं देंगे। आदिवासियों के इतिहास को भुलाने नहीं देंगे... और आदिवासियों को उसका अपना कोड दिलाने की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।