संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन में मध्यप्रदेश सरकार की कथित लापरवाही
मध्यप्रदेश में मंत्री विजय शाह से जुड़े एक गंभीर प्रकरण ने प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और न्यायिक आदेशों के पालन को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
राज्यपाल को पत्र, सरकार से स्पष्ट सवाल
मैंने इस विषय में माननीय राज्यपाल महोदय का ध्यान आकर्षित करते हुए पत्र लिखा है। मेरा स्पष्ट प्रश्न है कि जब माननीय सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में कार्रवाई के निर्देश दे चुका है, तो राज्य सरकार अभियोजन की स्वीकृति के संबंध में अब तक स्पष्ट और विधिसम्मत निर्णय क्यों नहीं ले रही है?
सरकार के सामने दो ही रास्ते हैं—कानून के अनुसार अभियोजन की स्वीकृति दे या उसे अस्वीकार करे। लेकिन किसी निर्णय को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन सरकार का दायित्व है
हमारा संविधान किसी सरकार या व्यक्ति से ऊपर है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पालन करना प्रत्येक राज्य सरकार का संवैधानिक और कानूनी दायित्व है।
यदि न्यायालय के निर्देश के बावजूद संबंधित प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि आखिर सरकार किसका इंतजार कर रही है?
किसी मंत्री या सत्ता में बैठे प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा मामला हो, तो सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में कानून का पालन केवल दिखाई नहीं देना चाहिए, बल्कि सरकार के हर निर्णय में उसकी निष्पक्षता स्पष्ट दिखाई देनी चाहिए।
सत्ता में बैठे व्यक्ति के लिए अलग कानून नहीं हो सकता
लोकतंत्र में मंत्री का पद किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं करता।
मेरा मानना है कि यदि किसी मंत्री के विरुद्ध गंभीर आरोपों से जुड़ा मामला है, तो सरकार को राजनीतिक सुविधा नहीं, बल्कि संविधान और कानून के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।
जनता यह जानना चाहती है कि सरकार का कानून सभी के लिए समान है या सत्ता में बैठे लोगों के लिए उसके मानदंड अलग हैं।
सरकार यदि अभियोजन की स्वीकृति देना उचित नहीं समझती, तो वह भी स्पष्ट कारणों के साथ निर्णय ले। यदि स्वीकृति देना कानूनन आवश्यक है, तो उसमें देरी क्यों हो रही है—इसका जवाब भी सरकार को देना चाहिए।
राज्यपाल से हस्तक्षेप का आग्रह
राज्यपाल संवैधानिक पद पर आसीन हैं। इसलिए मैंने उनसे आग्रह किया है कि पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार से विधि-सम्मत और स्पष्ट निर्णय सुनिश्चित कराया जाए।
यह किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध राजनीतिक अभियान का विषय नहीं है। यह सवाल शासन की जवाबदेही और संविधान की मर्यादा का है।
जब न्यायपालिका अपना दायित्व निभा चुकी है, तब कार्यपालिका भी अपने संवैधानिक दायित्व से पीछे नहीं हट सकती।
देरी भी एक तरह का सवाल है
न्याय की प्रक्रिया में समय का बहुत महत्व होता है। किसी संवेदनशील मामले में निर्णय को लंबे समय तक लंबित रखने से शिकायतकर्ता, आरोपी और आम जनता—सभी के मन में सवाल पैदा होते हैं।
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि अभियोजन की स्वीकृति से संबंधित प्रक्रिया वर्तमान में किस स्तर पर है, अब तक क्या कार्रवाई हुई है और अंतिम निर्णय लेने में कितना समय लगेगा।
सरकार का निर्णय किसी भी पक्ष में हो सकता है, लेकिन निर्णय कानून के अनुसार, लिखित कारणों के साथ और पारदर्शी तरीके से होना चाहिए।
विपक्ष का सवाल जनता का सवाल है
नेता प्रतिपक्ष के रूप में मेरा दायित्व है कि जब सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठें, जब संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर प्रश्न खड़े हों और जब न्यायालय के आदेशों के पालन को लेकर संदेह पैदा हो, तब मैं सरकार से जवाब मांगूं।
हमारा सवाल व्यक्तिगत नहीं है। हमारा सवाल व्यवस्था से है।
सरकार को बताना होगा कि क्या मध्यप्रदेश में कानून सभी के लिए बराबर है? क्या मंत्री और आम नागरिक के लिए एक ही कानूनी प्रक्रिया लागू होती है? और यदि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद भी निर्णय लंबित है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
संविधान सबसे ऊपर
मध्यप्रदेश की जनता ने सरकार को सत्ता संविधान के तहत शासन चलाने के लिए दी है, किसी व्यक्ति विशेष को संरक्षण देने के लिए नहीं।
मंत्री हो, विधायक हो, अधिकारी हो या आम नागरिक—कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
इसलिए मेरी मांग है कि राज्य सरकार इस पूरे मामले में अपना आधिकारिक पक्ष स्पष्ट करे, संबंधित प्रक्रिया और रिकॉर्ड की स्थिति सामने रखे तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और लागू कानून के अनुरूप शीघ्र निर्णय ले।
लोकतंत्र में सरकार की ताकत केवल बहुमत से नहीं, बल्कि संविधान के प्रति उसकी निष्ठा, न्यायपालिका के प्रति सम्मान और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही से तय होती है।
मध्यप्रदेश की जनता को जवाब चाहिए— जब सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश सामने है, तो निर्णय अब तक लंबित क्यों है?