मतदाता सूची में पारदर्शिता जरूरी, चुनाव आयोग जनता के सवालों का जवाब दे
वोट का अधिकार जनता की आवाज़
लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी ताकत होती है। जनता अपने वोट से सरकार चुनती है और सरकार को जवाबदेह बनाती है। इसलिए मतदान का अधिकार केवल एक संवैधानिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आम नागरिक की आवाज है। जब इसी अधिकार को लेकर सवाल उठने लगें, मतदाता सूची में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आएं और वोट चोरी के आरोप लगें, तो यह चिंता किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहती। यह पूरे लोकतंत्र की विश्वसनीयता का सवाल बन जाता है।
कांग्रेस का प्रदेशव्यापी विरोध प्रदर्शन
मध्यप्रदेश कांग्रेस ने 20 अक्टूबर को मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और वोट चोरी के आरोपों को लेकर प्रदेशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। इस अभियान के माध्यम से कांग्रेस चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रही है। पार्टी की मांग है कि मतदाता सूची में हुए बदलावों की पारदर्शी जांच हो और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब दिया जाए।
हर पात्र मतदाता का नाम सुरक्षित रहे
सवाल सीधा है। यदि लोकतंत्र में हर वोट की अहमियत है, तो हर पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित होना भी उतना ही जरूरी है। किसी नागरिक का नाम गलत तरीके से सूची से हट जाता है, तो केवल नाम नहीं कटता, बल्कि उसकी लोकतांत्रिक भागीदारी भी हट जाती है। गरीब, मजदूर, आदिवासी, दलित और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले नागरिकों के लिए अपने मताधिकार को सुरक्षित रखना पहले से ही चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में मतदाता सूची से जुड़ी किसी भी अनियमितता को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं है। उसकी जिम्मेदारी यह भी है कि चुनाव निष्पक्ष हों और हर पात्र नागरिक को मतदान का समान अवसर मिले। लेकिन चुनाव आयोग सत्तारूढ़ पार्टी का खिलौना बना हुआ है... यह साबित भी कई बार हो चुका है।
पुनरीक्षण जरूरी, पर अधिकार छीनने के लिए नहीं
मतदाता सूची का पुनरीक्षण जरूरी प्रक्रिया है। मृत, स्थानांतरित और दोहरे नामों को हटाना सूची को दुरुस्त करने के लिए जरूरी है। लेकिन इस प्रक्रिया में लाखों पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटा दिए गए हैं। नियमों का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध बनाना है, न कि किसी नागरिक को उसके अधिकार से वंचित करना।
एसआईआर पर उठते सवाल
आज मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भी बहस चल रही है। विपक्षी दलों ने आशंका जताई है कि इस प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं।
इन आशंकाओं का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया, सार्वजनिक आंकड़ों और शिकायतों के समयबद्ध निपटारे से होना चाहिए। यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे वापस जोड़ने की सरल व्यवस्था होनी चाहिए।
पारदर्शिता की मांग जनता का अधिकार
मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि चुनावी पारदर्शिता की मांग किसी राजनीतिक दल का निजी मामला नहीं है। यह जनता के अधिकारों से जुड़ा विषय है। विपक्ष का काम सरकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं से सवाल पूछना है। इन सवालों को केवल राजनीतिक विरोध कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। जरूरी है कि हर शिकायत की निष्पक्ष जांच हो और तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जाए।
जनता के बीच जाएगी कांग्रेस
मध्यप्रदेश में कांग्रेस इस मुद्दे को जनता के बीच ले जा रही है। कार्यकर्ताओं को मतदाता सूची से जुड़ी शिकायतों पर ध्यान देने और नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की जरूरत है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब आम आदमी को यह भरोसा होगा कि उसकी आवाज सुनी जा रही है और उसके वोट की रक्षा हो रही है।
चुनाव आयोग की जवाबदेही
चुनाव आयोग को भी अपनी निष्पक्षता और स्वतंत्रता के साथ-साथ जवाबदेही का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। मतदाता सूची में बदलावों की जानकारी सुलभ हो, शिकायतों का समय पर निराकरण हो और राजनीतिक दलों को जरूरी आंकड़ों की जांच का उचित अवसर मिले। इससे न केवल विवाद कम होंगे, बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग की असली परीक्षा तब है जब नागरिक का नाम मतदाता सूची से अचानक गायब न हो, कोई गरीब व्यक्ति अपने अधिकार के लिए दफ्तरों के चक्कर न लगाए और जब विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
हमारी मांग
हमारी मांग है कि हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहे, हर शिकायत की निष्पक्ष जांच हो और चुनाव आयोग जनता के सवालों का जवाब दे। लोकतंत्र में सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन जनता का मताधिकार स्थायी है। उसकी रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है।
वोट जनता की ताकत है। इस ताकत की रक्षा करना लोकतंत्र की पहली शर्त है।