भागीरथपुरा की रिपोर्ट छुपाने की कोशिश हुई - अब जवाबदेही तय होनी चाहिए
सिर्फ़ एक मोहल्ले की त्रासदी नहीं
इंदौर की रेसीडेंसी कोठी में मैंने जो कहा, वह किसी राजनीतिक आरोप से कहीं ज़्यादा गंभीर है। भागीरथपुरा में जो हुआ, वह सिर्फ़ एक मोहल्ले की त्रासदी नहीं थी। वह इस बात का सबूत है कि जब सरकार अपनी नाकामी छिपाना चाहती है, तो वह जांच रिपोर्ट तक को दबाने से नहीं हिचकती।
रिपोर्ट क्या कहती है
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में बना जांच आयोग महीनों तक इस मामले की पड़ताल करता रहा। जब रिपोर्ट तैयार हुई, तब भी उसे सार्वजनिक नहीं होने दिया गया। आख़िरकार हाईकोर्ट के आदेश पर करीब छह सौ पन्नों की यह रिपोर्ट वेबसाइट पर डाली गई।
रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि भागीरथपुरा में सप्लाई हो रहा पानी इंसानों के इस्तेमाल लायक ही नहीं था। पेयजल की पाइपलाइन में सीवेज का पानी घुस रहा था, और यही जहरीले प्रदूषण की जड़ थी। आयोग ने छत्तीस मौतों की जांच की, जिनमें से बाईस मौतें सीधे इसी दूषित पानी से जुड़ी पाई गईं।
मैंने खुद देखा, खुद जांचा
मैं यह सिर्फ़ रिपोर्ट पढ़कर नहीं कह रहा। सात जनवरी को मैंने खुद इंदौर में वाटर ऑडिट किया था। पानी के सैंपल में घातक ई-कोलाई बैक्टीरिया मिले। महीनों बीत गए, मगर हालात आज भी नहीं बदले।
एमजीएम मेडिकल कॉलेज की टीम ने जो साठ सैंपल जांचे, उनमें से पैंतीस यानी आधे से ज्यादा फेल निकले। इसका मतलब साफ़ है, पानी में फीकल कोलीफॉर्म और ई-कोलाई जैसे वही बैक्टीरिया मिले जो इंसानी मल-मूत्र में पाए जाते हैं। यह आंकड़ा मैंने नहीं गढ़ा, यह मेडिकल जांच का नतीजा है।
66 दिन की चुप्पी क्यों?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि आयोग की फ़ाइल छियासठ दिनों तक क्यों लंबित रखी गई। नगर निगम ने ज़रूरी दस्तावेज़ और तकनीकी रिकॉर्ड समय पर उपलब्ध नहीं कराए। यह सुस्ती नहीं थी, यह जानबूझकर की गई देरी थी ताकि जांच प्रभावित हो सके और असली ज़िम्मेदार लोग बच निकलें।
जिस इंदौर को स्वच्छता के लिए देश भर में मेडल मिलते रहे हैं, उसी इंदौर में लोगों को पीने का साफ़ पानी नसीब नहीं हो रहा, यह विडंबना नहीं तो और क्या है।
सिर्फ़ भागीरथपुरा की बात नहीं
मुझे डर है कि यह संकट सिर्फ़ एक इलाके तक सीमित नहीं है। शहर के करीब पचास निजी बोरिंग के पानी में भी वही बैक्टीरिया मिले हैं, और कुछ सरकारी अस्पतालों के पानी के सैंपल तक दूषित निकले, एमवाय अस्पताल भी इसमें शामिल है।
इसीलिए मैं खुद मदीना नगर और खजराना जैसी कॉलोनियों में जाकर घर-घर पानी की जांच करा रहा हूं। जब प्रशासन चुप बैठा हो, तो यह काम किसी को तो करना ही होगा।
मेरी मांग बहुत बड़ी नहीं
जनता की जान से खिलवाड़ करने वाली इस लापरवाही की जवाबदेही तय होनी चाहिए। मेरी मांग है:
- रिपोर्ट में नामजद अधिकारियों और जिम्मेदार नेताओं पर तुरंत कार्रवाई हो
- पीड़ित परिवारों को पर्याप्त मुआवज़ा दिया जाए
- शहर के पूरे पाइपलाइन और सीवेज नेटवर्क का स्वतंत्र ऑडिट हो
- भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना सार्वजनिक की जाए
यह मुद्दा नागरिक जीवन की सुरक्षा का है।
मैं यह मुद्दा यहीं नहीं छोड़ूंगा। जब तक हर ज़िम्मेदार का नाम सामने नहीं आता और हर पीड़ित को इंसाफ़ नहीं मिलता, यह लड़ाई सड़क पर भी जारी रहेगी।