भोपाल मास्टर प्लान: खास पर रहम, आम पर सितम, जानिए कैसे 3 लाख की आबादी पर लटकी बेघरी की तलवार
झीलों के शहर का प्रशासनिक विरोधाभास
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल, जिसे राजा भोज की नगरी और झीलों के शहर के रूप में जाना जाता है, आज एक अजीबोगरीब प्रशासनिक विरोधाभास का सामना कर रही है। राजा भोज द्वारा 11वीं शताब्दी में निर्मित बड़ा तालाब केवल भोपालवासियों की प्यास ही नहीं बुझाता, बल्कि इसका सौंदर्य दशकों से लोगों को शहर में बसने के लिए आकर्षित करता रहा है। लेकिन इसी खूबसूरती का ख्वाब दिखाकर बीते दो दशकों में बिल्डरों ने नियमों को ताक पर रखकर कैचमेंट (जल ग्रहण) क्षेत्र में हजारों घर बेच दिए।
जब तालाब के संरक्षण को लेकर अदालत का रुख सख्त हुआ, तो उम्मीद थी कि सरकार पारदर्शी नीति बनाएगी। लेकिन भोपाल के नए मास्टर प्लान के लागू होते ही साफ हो गया कि कानून का चाबुक सिर्फ आम जनता पर चल रहा है, जबकि रसूखदारों को अभयदान दे दिया गया है।
डूब क्षेत्र का गणित: 40 हजार मकान और 3 लाख जिंदगियां
आंकड़े बताते हैं कि बड़े तालाब के डूब व जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 40 हजार मकान बने हुए हैं, जिनमें 3 लाख से अधिक लोग निवास करते हैं। यह आबादी भोपाल की कुल जनसंख्या का करीब 13 प्रतिशत हिस्सा है। इतनी बड़ी आबादी के सामने अपने आशियाने उजड़ने का संकट खड़ा है, लेकिन सरकार के मास्टर प्लान ने इस संकट को भी अमीरों और गरीबों के बीच बांट दिया है।
मास्टर प्लान में सौतेला व्यवहार: नीलबड़ बनाम मेंडोरा-केरवा
मास्टर प्लान के मसौदे में रसूख और आम नागरिक के बीच का अंतर साफ नजर आता है:
- रसूखदारों के लिए सुरक्षा कवच: मेंडोरा, मेंडोरी और केरवा जैसे क्षेत्रों में, जहां प्रभावशाली लोगों, बड़े अधिकारियों और नेताओं के आलीशान फॉर्म हाउस व बंगले मौजूद हैं, उन्हें न केवल सुरक्षित दायरा दिया गया, बल्कि वहां जमीन के सरकारी (कलेक्टर) रेटों में 200 प्रतिशत (तीन गुना) तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
- आम जनता पर बेघरी का खतरा: इसके ठीक विपरीत, वार्ड 26 के अंतर्गत आने वाले नीलबड़ जैसे सघन और मध्यमवर्गीय इलाकों को मास्टर प्लान में वैध होने का सौभाग्य नहीं मिला। यहां जमीनों के दाम जस के तस बने हुए हैं और हजारों आम परिवारों पर बुलडोजर और बेघरी का डर लगातार मंडरा रहा है।
कागज़ पर लकीरें बदलीं, रसूख बचा
नगरीय विकास एवं आवास विभाग के इस दोहरे रवैये ने सरकार के 'अंत्योदय' के दावों की पोल खोलकर रख दी है। अगर मास्टर प्लान का मकसद पर्यावरण बचाना है, तो कंक्रीट के अवैध जंगल खड़े करने वाले बड़े बिल्डरों और भ्रष्ट अफसरों पर गाज गिरनी चाहिए थी, न कि अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई से एक छोटा सा घर बनाने वाले 3 लाख आम नागरिकों पर।
नीलबड़ जैसी बसावटों के साथ हुआ यह पक्षपात तुरंत खत्म होना चाहिए, क्योंकि सरकारें कागज़ की लकीरें बदलकर रसूखदारों को तो अभयदान दे सकती हैं, लेकिन आम जनता के सपनों पर बुलडोजर चलाकर बेघरी का दर्द छुपाना मुमकिन नहीं होगा।