बालाघाट पुकारे, राहुल पधारे
जनता की आवाज़ बनना ही कांग्रेस का मूल मंत्र
लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है और उनके मुद्दों को पूरी प्रखरता से उठाना ही राजनीति का असली उद्देश्य है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1885 से लेकर अपने 141 वर्षों के ऐतिहासिक सफर में हमेशा इसी मूल मंत्र का पालन किया है। 1885 से 1947 तक अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों से लोहा लेकर देश को आजाद कराने से लेकर आजादी के बाद की चुनौतियों का सामना करने तक, कांग्रेस ने जनता के भरोसे और प्यार को सर्वोपरि रखा है।
जब सत्ता मिली, तो जनहित के दूरगामी निर्णय लेकर देश को विकास के पथ पर अग्रसर किया और आज जब विपक्ष में हैं, तो पूरे देश में आमजन की निर्भीक आवाज बने हुए हैं। हमारे नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 'लीडिंग फ्रॉम द फ्रंट' की मिसाल पेश करते हुए इस भूमिका को बखूबी निभा रहे हैं। वे देश भर में भाजपा की डबल इंजन सरकारों की पोल खोल रहे हैं और जनता के मुद्दों को सड़क से संसद तक मजबूती से उठा रहे हैं।
इंदौर से उठी गूंज और बालाघाट की पुकार
देश के हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश की जनता राहुल गांधी से अगाध स्नेह करती है और वे भी यहाँ की समस्याओं को अपनी प्राथमिकता मानकर लगातार जनता के बीच बने रहते हैं।
इंदौर में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम इसका जीवंत प्रमाण है। इस मंच पर जब मध्य प्रदेश के युवाओं ने पेपर लीक और बेरोजगारी पर अपनी बात रखी, वहीं एक जागरूक छात्र ने मंच से बालाघाट में कुपोषण और स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली का गंभीर मुद्दा सीधे राहुल गांधी के सामने उठाया था। राहुल जी ने न केवल उस युवा की बात को ध्यान से सुना, बल्कि युवाओं के उस दर्द को अपनी प्राथमिकता में शामिल किया।
भारतीय जनता पार्टी ने इस जन-संवाद को 'राजनीतिक हथकंडा' बताकर खारिज करने की कोशिश की, लेकिन राहुल जी का उद्देश्य स्पष्ट था—विपक्ष के नेता के रूप में सरकार से सवाल पूछना और युवाओं को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से सीधे आंख में आंख डालकर सवाल करने का मंच देना।
बालाघाट की त्रासदी और मासूमों का दर्द
जब इंदौर के मंच पर उठे बालाघाट के मुद्दे ने राहुल गांधी के संवेदनशील दिल को छुआ, तो वहां कुपोषण के कारण असमय काल के गाल में समाए मासूम बच्चों के दर्द ने उन्हें गहरा आहत किया। बालाघाट में कई घरों के चिराग सिर्फ इसलिए बुझ गए क्योंकि राज्य सरकार का पूरा ध्यान अपनी ब्रांडिंग, इवेंटबाजी और पार्टी एजेंडे को चमकाने में लगा रहा।
राहुल जी इन मासूमों की मौत से व्यथित हैं। वे उसी छात्र और बालाघाट की जनता की आवाज पर उन पीड़ित परिवारों का दर्द बांटने बालाघाट पहुंच रहे हैं, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था।
घोषणाओं की बौछार, पर जमीनी हकीकत शून्य
भाजपा सरकार की कार्यशैली "सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया" जैसी हो चुकी है। बालाघाट में बच्चों की मौत की खबर के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणाओं की झड़ी लगाई और आनन-फानन में आर्थिक पैकेज का ऐलान कर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत आज भी जस की तस बनी हुई है:
- अस्पतालों की बदहाली: स्वास्थ्य सुविधाओं में कोई सुधार नहीं हुआ है, ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक उपचार का अभाव है।
- सफाई और पोषण का संकट: न तो स्वच्छता व्यवस्था सुधरी है और न ही बच्चों को मिलने वाले पोषण आहार की गुणवत्ता में कोई बदलाव आया है।
- विदेशी दौरों का मोह: एक तरफ बालाघाट में बच्चे कुपोषण से दम तोड़ रहे हैं, दूसरी तरफ मुख्यमंत्री जी प्रदेश में निवेश के नाम पर दुबई की यात्राएं कर रहे हैं और शासकीय दौरों में व्यस्त हैं।
संवेदना बनाम राजनीति
भाजपा के मंत्री और नेता राहुल गांधी के इस दौरे पर कटाक्ष कर रहे हैं और उनकी संवेदनाओं को 'सियासत' से जोड़कर देख रहे हैं। लेकिन राहुल जी का बालाघाट आने का एकमात्र मकसद पीड़ित परिवारों का गम बांटना और सोई हुई सरकार को उसका संवैधानिक व नैतिक फर्ज याद दिलाना है।
कांग्रेस पार्टी 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' के मंत्र पर अमल करती है। राहुल गांधी का बालाघाट दौरा यह स्पष्ट संदेश देता है कि जब-जब सरकारें असंवेदनशील होंगी और जनता पर दुखों का पहाड़ टूटेगा, तब-तब कांग्रेस जन-जन के साथ खड़ी नजर आएगी।