जनता दुखिया, जेट से उड़ेंगे एमपी के मुखिया
प्रदेश से लगातार आ रहीं बुरी खबरें
पिछले कई दिनों से राज्य के अलग अलग हिस्सों से बुरी खबरें आ रहीं थीं — जैसे सागर के बंडा में जहरीली शराब पीने से करीब 28 लोगों की मौत, वो राज्य जहां के जूनियर डॉक्टरों को आज की महंगाई के दौर में अपना स्टाइपेंड 14 हजार से 30 हजार रुपए कराने के लिए राजधानी भोपाल में रात के अंधेरे में लाठियां खानी पड़ी हो, बालाघाट में कुपोषण के कारण बड़ी संख्या में बच्चों की मौत से लाड़ली बहनों की गोद सूनी हो गई हो, जिस राज्य में रीवा के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल में बदइंतजामी के कारण प्रसव के दौरान महिला की मौत हो जाए और उस महिला को अस्पताल में घुसते ही खराब स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण मौत का डर सताए और वो अपने पापा से उस अस्पताल से निकालने की गुहार लगाए।
विकास के ज्यादातर मानदंडों के हिसाब से नीति आयोग की रिपोर्ट में भी जो राज्य निचले पायदान पर हो, जिस राज्य पर 5 लाख 40 हजार करोड़ रुपए का कर्ज हो, उस राज्य के मुखिया का फर्ज क्या होना चाहिए कि पहले जनता जनार्दन की सुध ले। लेकिन मध्यप्रदेश में तो बिल्कुल उल्टा ही हो रहा है — सीएम मोहन यादव जी, आपको और आपकी सरकार को प्रदेश की आर्थिक तंगहाली और जनता की बदहाली से ज्यादा अपने ऐशो आराम की चिन्ता है।
350 करोड़ का नया जेट
हाल ही में आप विदेशी निवेश लाने के नाम पर दुबई के दौरे से लौटे हैं और अब ये खबर आ रही है कि आपका उड़नखटोला बदलने वाला है। आप 350 करोड़ के नए जेट बॉम्बार्डियर चैलेंजर से उड़ेंगे यानी प्रदेश का दौरा करेंगे। ये विमान इसी महीने की आखिर में प्रदेश की राजधानी भोपाल के स्टेट हैंगर की शोभा बढ़ा रहा होगा। टैक्स चुकाने के बाद इसकी लागत करीब साढ़े तीनसौ करोड़ होगी।
सिर्फ विमान की लागत ही नहीं, इस विमान को उड़ाने और लैंडिंग के लिए राज्य के 18 शहरों की हवाई पट्टियों की लंबाई भी बढ़ानी पड़ेगी, जिस पर अलग से 400 करोड़ रुपए खर्च होंगे क्योंकि बॉम्बार्डियर चैलेंजर के लिए 1800 मीटर के रनवे की जरूरत होती है। हवाई पट्टियों की लंबाई बढ़ाने के लिए जमीन अधिग्रहण की जरूरत होगी, जिसके लिए इस कर्ज के बोझ तले दबे राज्य के सरकारी खजाने से तीस-चालीस करोड़ रुपए मुआवजे के तौर पर जमीन मालिकों को बांटना होगा।
हाथी पाला है तो महावत भी चाहिए
ये तो हुई सीएम के शाही उड़न खटोले के देश में आने और रनवे पर रुपया बहाने की बात। अब जब हाथी पाला है तो महावत भी तो हो जो राजा को इसकी सवारी करा सके — तो उसके लिए भी जनता की जेब पर बोझ डाला गया और दो वरिष्ठ पायलटों को अमेरिका में स्पेशल ट्रेनिंग दी गई, जिस पर अलग से 50 लाख रुपए का खर्च आया।
इस उड़न खटोले की खरीद, उड़ान के लिए हवाई पट्टियों को तैयार करने और पायलटों की विदेश में ट्रेनिंग पर आए भारी भरकम खर्च और राज्य की माली हालत को देखकर लगता है कि खाने को नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने।
स्कूलों पर पड़ता असली असर
सीएम मोहन यादव जी, आपके इस विदेशी उड़न खटोले को विदेश से खरीदने, इसकी लैंडिंग के हवाई पट्टियों की लंबाई बढ़ाने में जो मोटा पैसा खर्च हुआ है, उससे राज्य की कई ज्वलन्त समस्याओं का समाधान हो सकता था जिनसे हमारी जनता आज जूझ रही है।
हाल ही में एक खबर आई कि एमपी सरकारी स्कूलों के बंद होने के मामले में पूरे देश में पहले नंबर पर है — राज्य में सबसे ज्यादा 2 हजार 426 स्कूल बंद हुए हैं। सीएम साहब, आपके लिए जेट पर खर्च हुए उस 350 करोड़ रुपए में राज्य के 7 हजार स्कूलों को हाईटेक स्मार्ट स्कूलों में बदला जा सकता था। हमारे सरकारी स्कूलों में 35 हजार रुपए मासिक वेतन पर 8 हजार से अधिक शिक्षकों को बहाल किया जा सकता था, जिससे प्रदेश का भविष्य संवर जाता।
हमारे राज्य के बच्चे जान जोखिम में डालकर जर्जर भवनों वाले सरकारी स्कूल में पढ़ने को मजबूर हैं। अगर आपने खुद के लिए इतना महंगा विदेशी उड़न खटोला नहीं लिया होता, तो हर स्कूल के भवन की मरम्मत पर 1 करोड़ रुपए खर्च कर साढ़े तीन सौ सरकारी स्कूलों के भवनों का जीर्णोद्धार किया जा सकता था।
अस्पतालों और एंबुलेंस की बदहाली
अक्सर खबरें आती हैं कि राज्य की सरकारी अस्पतालों की बदहाली के कारण उचित इलाज नहीं मिलने से मरीजों की जान चली जाती है। ऊपर मैंने रीवा में मौत से पहले प्रसूता के सरकारी अस्पताल में मौत से पहले परिजनों से वहां इलाज नहीं कराने के अनुरोध वाले मार्मिक वीडियो का जिक्र किया है। जो साढ़े तीन सौ करोड़ आपने विदेशी विमान खरीदने और उसके रख-रखाव में लगाए, उससे प्रदेश भर में करीब 1100 उप स्वास्थ्य केंद्रों में अच्छे इलाज की व्यवस्था हो सकती थी।
आपके शासन में आए दिन खबरें आती हैं कि ग्रामीण और दूर दराज के इलाकों में एंबुलेंस न मिलने के कारण रास्ते में ही मरीज की मौत हो गई। जो रकम आपने सुखद हवाई यात्रा के लिए खर्च की, उससे 20 लाख रुपए प्रति वाहन के हिसाब से 1750 नई एंबुलेंस खरीदी जा सकती थीं, जिससे इलाज की आपातकालीन व्यवस्था बेहतर होती।