बुआ जी की याद: जमुना देवी का संघर्ष और विरासत
विरासत सौंपकर विदा होने का दिन
24 सितंबर 2010 वह दिन है, जब मेरी बुआ जमुना देवी जी अपने संघर्ष की राजनीतिक विरासत सौंप कर विदा हुई थीं।
मध्य प्रदेश की पहली महिला उपमुख्यमंत्री और आदिवासी समाज की मजबूत आवाज जमुना देवी को हमसे दूर हुए आज 16 वर्ष हो गए हैं, लेकिन समय के साथ उनकी याद कम नहीं हुई। आज आदिवासी समाज, गरीब, महिलाएं और वंचित लोग, परेशान नागरिक अपने अधिकारों की बात करते हैं, मुझे बुआ जी का संघर्ष याद आता है।
प्यार और सम्मान से "बुआ जी"
प्रदेश की राजनीति में उन्हें प्यार और सम्मान से 'बुआ जी' कहा जाता था। यह संबोधन उनके व्यक्तित्व की आत्मीयता से उपजा था। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी आत्मीयता थी कि राजनीतिक मतभेद रखने वाले लोग भी उनके साहस और उनकी स्पष्टता का सम्मान करते थे।
1952 से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
जमुना देवी जी का सार्वजनिक जीवन बहुत लंबा रहा। उन्होंने 1952 में मध्य भारत की पहली विधानसभा से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। इसके बाद वे लोकसभा और राज्यसभा की सदस्य रहीं। मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाली और 1998 में प्रदेश की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनीं। 2003 के बाद उन्होंने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई और 2009 से अपने निधन तक इस जिम्मेदारी पर रहीं।
पदों से आगे की पहचान
बुआ जी को सिर्फ उनके पदों से समझना उनके व्यक्तित्व के कई हिस्सों को अनदेखा करने जैसा होगा। उनकी असल पहचान उन लोगों के बीच थी, जिनकी आवाज सत्ता और व्यवस्था तक आसानी से नहीं पहुंचती थी। राज्यसभा के शोक संदेश में भी उनके आदिवासी गांवों की महिलाओं और बच्चों के उत्थान के लिए किए गए काम का उल्लेख मिलता है।
संघर्ष के साथ खड़े होने का रास्ता
मैंने बचपन से उन्हें करीब से देखा। उनके लिए राजनीति चुनाव जीतने या पद हासिल करने तक सीमित नहीं थी। राजनीति उनके लिए लोगों के संघर्ष के साथ खड़े होने का रास्ता थी।
अपनी बात कहने से कभी न डरना
उनकी सबसे बड़ी सीख थी - अपनी बात कहने से कभी डरना नहीं।
बुआ जी बेबाक थीं। सामने कोई कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो, अगर उन्हें लगता था कि किसी गरीब, आदिवासी, महिला या कमजोर व्यक्ति के साथ अन्याय हो रहा है तो वे अपनी बात खुलकर रखती थीं। उनकी स्पष्टता कई बार राजनीतिक बहसों को तीखा बनाती थी, उनका यह स्वभाव उनके राजनीतिक जीवन की ताकत था।
आदिवासी समाज की जागरूकता के लिए काम
उन्होंने आदिवासी समाज की राजनीति को सिर्फ प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रखा। वे चाहती थीं कि आदिवासी समाज अपने अधिकारों को समझे, शिक्षा से जुड़े, अपनी जमीन और संसाधनों के प्रति जागरूक रहे और लोकतंत्र में अपनी भागीदारी निभाए।
आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो महसूस होता है कि उस दौर में एक आदिवासी महिला का इतने लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहना अपने आप में बड़ी बात थी। लेकिन बुआ जी ने सिर्फ रास्ता बनाया नहीं, उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ते को आसान भी किया। उन्होंने हमें राजनीति के संघर्ष का नक्शा भी दिया।
विरासत सोच से बनती है
उनका जाना व्यक्तिगत क्षति के साथ-साथ मेरे लिए एक राजनीतिक खालीपन भी था। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि उनके जाने के बाद मैंने यह समझा कि विरासत सिर्फ किसी पद या कुर्सी से नहीं बनती। विरासत उस सोच से बनती है, जिसे हम अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं।
क्या हम उनके सपनों के समाज की तरफ बढ़े?
आज बुआ जी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल यही आता है कि क्या हम उनके सपनों के समाज की तरफ आगे बढ़ पाए हैं?
जब किसी आदिवासी बच्चे को शिक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जब किसी गरीब परिवार को अपने अधिकार के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जब किसी महिला और किसी परेशान हाल नागरिक की आवाज को गंभीरता से नहीं सुना जाता, तब मुझे लगता है कि बुआ जी का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।
संघर्ष को आगे बढ़ाना ही सच्ची श्रद्धांजलि
उनकी विरासत को याद करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम उनके संघर्ष को आगे बढ़ाएं।
बुआ जी ने हमें सिखाया कि राजनीति में संवेदना के साथ संघर्ष जरूरी है और सबसे जरूरी है— अपने नागरिकों के साथ खड़े रहने का साहस।
आज उनकी पुण्यतिथि पर मैं उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं।
बुआ जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज, उनका साहस और लोगों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता आज भी हमारे रास्ते को रोशन कर रही है।
उनकी स्मृति को मेरा नमन।