अंधेरे में राजधानी, कागज़ों में बिजली "सरप्लस"
सरप्लस बिजली, फिर कटौती क्यों?
मोहन सरकार समझती है जनता को सरप्लस बिजली का मायना नहीं पता। सब जानते हैं सरप्लस का मतलब मांग से ज्यादा बिजली है। अब सवाल है कि सरप्लस है तो भोपाल के कई इलाकों में बिजली आती-जाती क्यों है। कई इलाकों में कम वोल्टेज की शिकायत है।
लालटेन लेकर पहुँचे रहवासी
सरकार का दावा है कि मध्यप्रदेश बिजली के मामले में सरप्लस राज्य है। इस सरकारी दावे की हवा यहीं निकल जाती है। गाँवों और छोटे शहरों के हाल और बदतर हैं। भोपाल में इस विरोधाभास को लेकर रहवासी कांग्रेस नेताओं के साथ हाथों में लालटेन लिए पावर मैनेजमेंट कंपनी के दफ़्तर पहुँचे और स्वतंत्र जाँच की माँग की।
क्योंकि सरकार केवल अपनी तारीफ करने में लगी है। जमीन पर हालत बेहद ख़राब हैं। न किसानों को पर्याप्त बिजली मिल रही और न उद्योगों को।
आम नागरिकों की रोज़ की परेशानी
प्रदर्शनकारी नागरिकों का कहना है कटौती अब रोज़ के हाल बन चुके हैं। परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थी परेशान हैं। दुकानदार का काम ठप हो जाता है और बीमार व बुज़ुर्गों के लिए रातें भारी पड़ती हैं। राजधानी की यह हालत है तो छोटे शहरों और गाँवों की स्थिति का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं।
असल दिक्कत उत्पादन में नहीं, वितरण में
जब सरप्लस का मतलब है कि माँग से ज़्यादा बिजली बन रही है, सवाल यह है कि वह बिजली उपभोक्ता तक क्यों नहीं पहुँच रही। जानकारों के मुताबिक ऐसे मामलों में अक्सर दिक्कत उत्पादन में नहीं, वितरण नेटवर्क में होती है, यानी पुराने ट्रांसफार्मर, जर्जर लाइनें और रखरखाव की कमी इसका कारण हैं। विपक्ष का आरोप है कि इन मदों पर खर्च होने वाली रकम का हिसाब सार्वजनिक नहीं किया गया।
आंकड़े क्या कहते हैं
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में मध्य प्रदेश की कुल ऊर्जा आवश्यकता 1,04,445 मिलियन यूनिट रही, जबकि 1,04,312 मिलियन यूनिट बिजली की आपूर्ति हुई और 133 मिलियन यूनिट Energy Not Supplied रही। 2025-26 में ऊर्जा आवश्यकता 1,03,711 मिलियन यूनिट रही और आपूर्ति 1,03,696 मिलियन यूनिट हुई, यानी Energy Not Supplied 15 मिलियन यूनिट रही।
क्या इसका मतलब यह है कि इस बिजली को ही सरकार सरप्लस बता रही है? नॉट सप्लाई बिजली को सरप्लस के आधार पर खुद ही वाही-वाही लूट रही है। दूसरी तरफ आम जनता और किसानों को बिजली नहीं मिल रही।
लालटेन: विज्ञापन और हकीकत के फर्क का प्रतीक
भोपाल के लोगों ने लालटेन को प्रतीक के तौर पर चुना। उनके मुताबिक विज्ञापनों और मंचों पर जिस सरप्लस उजाले का दावा होता है, ज़मीन पर उसका हकीकत में कोई रिश्ता नहीं होता।
सरकार के बहाने
सरकार के बहाने भी हैं। बिजली कंपनियाँ और सरकार आमतौर पर कटौती को तकनीकी खराबी, मौसम या मरम्मत से जुड़ी अस्थायी समस्या बता कर पल्ला झाड़ते हैं। उनका तर्क रहता है कि उत्पादन क्षमता और वितरण की चुनौतियाँ अलग मुद्दे हैं।
जाँच और जवाबदेही की मांग
रहवासियों ने कटौती के कारणों की जाँच, ज़िम्मेदारी तय करने और रिपोर्ट सार्वजनिक करने की माँग रखी है। साथ ही वितरण व्यवस्था सुधारने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना माँगी गई है। जब तक हर घर में पर्याप्त बिजली नहीं पहुँचती, सरप्लस का दावा सवालों के घेरे में रहेगा।
बहानेबाजी कब तक चलेगी?
यह बहानेबाजी कब तक चलेगी। मानसून से पहले कटौती, मानसून में कटौती, गर्मियों में भी यही बहाने। सरकार और विद्युत विभाग अपनी कार्यशैली में सुधार करे और जनता को जरूरत के मुताबिक बिजली सप्लाई दे।
जनता को यह जानने में दिलचस्पी नहीं कि बिजली कितनी बनती है; वह तो अपने काम पूरे करना चाहती है। उसे जरूरत की बिजली मिले, सरप्लस सरकार ही रखे।