छात्रों की गूंज: राहुल गांधी दे रहे हैं देश की राजनीति को नई दिशा
इंदौर के मैदान से ऐतिहासिक मोड़
19 सितंबर की शाम इंदौर के मैदान में खड़े होकर लगा कि प्रदेश की राजनीति ऐतिहासिक मोड़ पर आ गई है। जो लोग इसे एक और राजनीतिक आयोजन समझ रहे थे, उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि यह गूंज कितनी दूर तक जाएगी।
आसान नहीं थी शुरुआत
शुरुआत आसान नहीं थी। हमने नेहरू स्टेडियम मांगा, अनुमति नहीं मिली। फिर रीजनल पार्क के सामने का मैदान तय हुआ, तारीख बदली और पूरी तैयारी नए सिरे से करनी पड़ी। हमारे कार्यकर्ताओं ने हिम्मत नहीं हारी। प्रदेश के कोने-कोने से युवा इंदौर पहुँचे। इसे किसी ने भीड़ बनाकर नहीं जुटाया, यह छात्रों की अपनी बात कहने की बेचैनी थी। मैदान के भीतर जितने छात्र थे, उससे कई गुना बाहर सड़कों पर खड़े थे।
कोटा से इंदौर तक की यात्रा
इस आंदोलन का सिलसिला राहुल गांधी जी ने कोटा में नीट की तैयारी करने वाले बच्चों को सुनकर की थी। देहरादून में बारिश के बावजूद हज़ारों छात्र डटे रहे। प्रयागराज के केपी ग्राउंड में, जहाँ देश के सबसे ज़्यादा युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, युवाओं ने अपना दर्द रखा।
पुणे में 22 अगस्त को छात्राओं के लिए विशेष कार्यक्रम हुआ, जहाँ शिक्षा, सुरक्षा और बराबरी के सवाल उठे। हर शहर ने इस आंदोलन में कुछ जोड़ा, और इंदौर तक आते-आते यह गूंज एक आंदोलन की आवाज बन चुकी है।
जबलपुर से पूरे प्रदेश तक सीधा प्रसारण
इंदौर में जब कार्यक्रम चल रहा था, उसी शाम जबलपुर में जिला कांग्रेस कमेटी ने शहर के अलग-अलग चौराहों पर सीधा प्रसारण की व्यवस्था की। गुलौआ चौक, शास्त्री नगर, छोटी लाइन चौक, दमोह नाका, बिलहरी, घमापुर — जगह-जगह कार्यकर्ता, छात्र और आम नागरिक स्क्रीन के सामने जुटे। मंच इंदौर में था, पर सुनने वाला पूरा प्रदेश था।
इसके पीछे कांग्रेस की एकजुटता थी। पुराने और नए कार्यकर्ता, ज़िलों के नेता, सब एक लक्ष्य के लिए जुटे।
हर वर्ग की साझा पीड़ा
यह गूंज किसी जाति, धर्म या वर्ग की नहीं है। इसमें वह लड़की भी है जो सालों से भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रही है, और वह लड़का भी है जिसका पर्चा लीक हो गया। इसमें गाँव का किसान परिवार भी है और शहर का मध्यमवर्गीय भी। सबकी परेशानी एक है: नौकरी नहीं मिल रही, परीक्षाओं में भ्रष्टाचार हो रहा है और पढ़ाई का खर्च बढ़ता जा रहा है।
आदिवासी युवाओं के साथ अन्याय
मंच पर रायसेन के सूरज ठाकुर ने आदिवासी समाज के साथ हो रहे अन्याय की बात रखी। 2022 की सिविल जज भर्ती में आदिवासी उम्मीदवारों के लिए 121 पद थे, पर एक भी आदिवासी युवा का चयन नहीं हुआ। क्या इतने बड़े आदिवासी समाज में एक भी युवा जज बनने के काबिल नहीं था? ऐसे सवाल दबाए जाते हैं, इसीलिए इस मंच का होना ज़रूरी था। यही वह आवाज है जिसकी सबको दरकार है।
सवाल पूछना सीख गई नई पीढ़ी
छात्र सिर्फ हमारा भविष्य नहीं हैं, वे देश और प्रदेश के सद्भाव और वैज्ञानिक सोच के प्रहरी भी हैं। आज समाज को जाति-धर्म के टुकड़ों में बाँटने की कोशिशें हो रही हैं, तब यही नई पीढ़ी सवाल पूछना जानती है। जो पीढ़ी सवाल पूछना सीख जाती है, उसे लंबे समय तक बहलाया नहीं जा सकता। नीट हो, पेपर लीक हो, व्यापमं हो या पटवारी भर्ती, हर एक के पीछे किसी परिवार की उम्मीद टूटी है। सरकार पर युवाओं का विश्वास कम हुआ है।
एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहेगा असर
मेरा मानना है कि इस आंदोलन का असर एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहेगा। मध्य प्रदेश की राजनीति अब तक भाजपा के फैलाए जातिवाद, धार्मिक नफरत और भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जिसके द्वारा नकारात्मक राजनीति की गई है। शहरों और कॉलेजों के नाम बदलने के अलावा कुछ नहीं किया।
इंदौर में छात्रों की गूंज ने, राहुल गांधी के नेतृत्व ने राजनीतिक बहस की दिशा बदली है। अब चर्चा रोज़गार, पारदर्शी भर्ती, पेपर लीक और शिक्षा के बजट और सुरक्षा पर है। जिस प्रदेश में लाखों युवा पहली बार अपने सवाल लेकर खुद सामने आए हों, वहाँ मध्यप्रदेश सरकार भी इसे अनदेखा नहीं कर सकती। आने वाले चुनावों में युवा मतदाता वादों से नहीं, जवाबों से फ़ैसला करेगा।
भरोसे की राजनीति की शुरुआत
कांग्रेस के लिए यह नए भरोसे और विश्वास की राजनीति की शुरुआत है।
मैं यह मानता हूं कि एक कार्यक्रम से सारी समस्याएँ हल नहीं होतीं। लेकिन इतना ज़रूर हुआ है कि प्रदेश का युवा अब चुप नहीं रहा है। राहुल जी ने उसको आवाज दी है, हम इन मुद्दों को जनता के बीच उठाएँगे। इंदौर से उठी यह आवाज़ अब पूरे देश और मध्य प्रदेश की आवाज़ है, और मैं हर उस युवा को सलाम करता हूँ जो इस गूंज का हिस्सा बना।
सच यह है कि ये सच की गूँज है जिसे राहुल गांधी ने एक नया आयाम दिया है।