लोकतंत्र की लड़ाई: राहुल गांधी के मार्च से घबराई सरकार
दिल्ली की सड़कों पर देश की आवाज़
आज दिल्ली की सड़कों पर जो दिखा, वह केवल विरोध मार्च नहीं था, देश की आवाज़ थी।
आज लोग महसूस करने लगे कि भाजपा उनके वोट पर डाका डाल रही है। जनता को लग रहा है कि उसके वोट का हक़ धीरे-धीरे छीना जा रहा है।
'सेव डेमोक्रेसी मार्च' और विपक्ष की मांगें
मंगलवार सुबह 11 बजे INDIA गठबंधन के 140 से ज़्यादा सांसदों ने संसद भवन से निर्वाचन सदन तक 'सेव डेमोक्रेसी मार्च' शुरू किया। मांगें साफ़ थीं: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफ़ा दें, और SIR की प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं पर जवाब मिले। गठबंधन की यह मुहिम 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक चल रही है।
शांतिपूर्ण मार्च से डरी सरकार
सरकार को इस मार्च से डर था, यह उसके इंतज़ामों से दिख गया। राजधानी में तीन हज़ार से ज़्यादा पुलिसकर्मी और RAF की टुकड़ियाँ तैनात की गईं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन से इतनी डरी है सरकार कि जगह-जगह बैरिकेड लगा दिए।
नई दिल्ली इलाके के 11 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए। सरकार कहती है कि सब कुछ ठीक है, तो वे अपने ही विपक्षी सांसदों को तीन किलोमीटर चलने से क्यों रोक रहे थे?
बैरिकेड पर तिरंगा
रास्ते में पुलिस ने बैरिकेड लगा दिए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और कई सांसद वहीं धरने पर बैठ गए। कुछ सांसद बैरिकेड पर चढ़े, और राहुल गांधी ने बैरिकेड पर चढ़कर तिरंगा लहराया।
लोकतंत्र की रक्षा के लिए तिरंगा थामे चलना कौनसा अपराध है? ख़बरों के मुताबिक़ अखिलेश यादव को भी हिरासत में लिया गया। अखिलेश जी ने सही सवाल उठाया कि चुनाव आयोग पर आरोप पहली बार नहीं लगे हैं, और चंडीगढ़ मेयर चुनाव की चालबाज़ी को कौन भूल सकता है। जिस संस्था को निष्पक्ष अंपायर होना था, वह खिलाड़ी की तरह व्यवहार करे तो सवाल उठेंगे ही।
मध्यप्रदेश में 31 लाख नाम कटे
यह लड़ाई मध्यप्रदेश की भी है। हम देख रहे हैं कि SIR में मप्र के 31 लाख से ज़्यादा नाम काटे गए, और बहाली की खिड़की में अब तक 10-11 लाख का एक हिस्सा ही लौट पाया है। जिन ग़रीबों, मज़दूरों, बेटियों और प्रवासियों के नाम कटे, उनके पास न दफ़्तरों के चक्कर काटने का वक़्त है, क्योंकि वे मजदूरी करते हैं, और न काग़ज़ जुटाने की ताक़त।
मतदाता सूची से नाम कटना किसी के लिए काग़ज़ की गलती है, पर लोकतंत्र में यह उसके नागरिक होने पर सवाल है।
जवाब के नाम पर बैरिकेड और हिरासत
इस मार्च से पहले 2 अक्टूबर को गांधी जयंती पर भी दिल्ली में प्रदर्शन हुए थे और सैकड़ों लोग हिरासत में लिए गए थे। हर बार जवाब के नाम पर मिलता है: बैरिकेड, हिरासत और बयानबाज़ी। सवालों के उत्तर सरकार क्यों नहीं देती?
चुनाव आयोग अपनी साख बचाए
हम चुनाव आयोग के विरोधी नहीं हैं। हम चाहते हैं कि चुनाव आयोग अपनी साख बचाए। मतदाता सूची की पारदर्शिता, काटे गए नामों का सार्वजनिक ब्योरा और सबकी सुनवाई हो, तभी चुनावों पर भरोसा लौटेगा। और अगर संस्थाएँ जवाब नहीं देंगी, तो जनता के बीच जाकर जवाब माँगना हमारा संवैधानिक अधिकार भी है और ज़िम्मेदारी भी।
जब तक हर पात्र नागरिक का नाम सूची में नहीं लौटता, यह लड़ाई जारी रहेगी, संसद में भी और सड़क पर भी। और देश के कोने-कोने में भी।