शिक्षा का व्यापार: आईटीआई पर निजीकरण की तलवार और एमपी के युवाओं का भविष्य
युवा कार्यबल पर निर्भर है प्रदेश की तरक्की
किसी भी देश या प्रदेश की तरक्की उसके वर्कफोर्स (कार्यबल) पर निर्भर करती है। जिस राज्य की युवा आबादी जितनी ज्यादा हुनरमंद और रोजगारयुक्त होगी, उसकी अर्थव्यवस्था उतनी ही तेजी से आगे बढ़ेगी। मध्य प्रदेश की 7 करोड़ से अधिक आबादी में युवाओं का आंकड़ा 2 करोड़ के पार है। आज के इन 'जेन-जी' (Gen-Z) और 'जेन-अल्फा' (Gen-Alpha) युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी योग्यता के मुताबिक सम्मानजनक रोजगार पाने की है।
जो युवा संपन्न परिवारों से हैं, वे भारी-भरकम फीस देकर निजी कॉलेजों में उच्च तकनीकी शिक्षा हासिल कर लेते हैं। लेकिन राज्य की एक बहुत बड़ी गरीब और आदिवासी आबादी रोजगारपरक प्रशिक्षण के लिए सिर्फ सरकारी आईटीआई (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों) पर निर्भर रही है। वजह साफ थी, सस्ती फीस और गुणवत्तापूर्ण हुनर।
लेकिन मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार के फैसलों ने इन गरीब छात्रों के सपनों पर निजीकरण का हथौड़ा चला दिया है। सरकारी कौशल विकास संस्थान अब धीरे-धीरे निजी कंपनियों के मुनाफे का जरिया बनते जा रहे हैं।
नेहरू का विज़न और आत्मनिर्भर भारत की नींव
जब बीजेपी और उसकी सरकारें पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के योगदान पर सवाल उठाती हैं, तो उन्हें आईटीआई के इतिहास को देखने की जरूरत है। वर्ष 1950 में आधुनिक भारत के निर्माण और बड़े बांधों, स्टील प्लांटों व भारी उद्योगों को तकनीकी कार्यबल देने के उद्देश्य से नेहरू जी ने आईटीआई (ITI) की नींव रखी थी।
उद्देश्य स्पष्ट था—उच्च तकनीकी हुनर के लिए आईआईटी (IIT) और धरातल पर काम करने वाले हुनरमंद कामगारों के लिए आईटीआई। नेहरू जी के लिए 'आत्मनिर्भर भारत' कोई चुनावी जुमला नहीं था, बल्कि देश को औद्योगिक रूप से सक्षम बनाने का ठोस रोडमैप था।
इसी का नतीजा है कि आज देश भर में लगभग 15,000 आईटीआई हैं। मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस सरकारों के दौरान 195 सरकारी आईटीआई स्थापित हुए, ताकि दूर-दराज के गरीब-आदिवासी बच्चे मुफ़्त या नाममात्र फीस पर हुनरमंद बन सकें।
कौशल विकास या 'कौशल विनाश'?
आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। राज्य का तकनीकी शिक्षा विभाग सरकारी संस्थानों को सुचारू रूप से चलाने की अपनी मूल जिम्मेदारी से भाग रहा है। प्रदेश के 42 आईटीआई को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी और प्रक्रिया चल रही है।
निजीकरण का सीधा असर गरीब छात्रों की जेब पर पड़ा है:
- फीस में भारी उछाल: जो प्रशिक्षण नाममात्र की फीस पर मिलता था, उसकी फीस अब ₹10,000 से बढ़कर ₹1.5 लाख तक पहुंच चुकी है।
- दिखावे का प्लेसमेंट: इतनी मोटी फीस वसूलने के बाद भी प्लेसमेंट के आंकड़े इतने निराशाजनक हैं कि सरकार के इस फैसले को पासिंग मार्क्स भी नहीं दिए जा सकते।
'परम फाउंडेशन' और धार के सरदारपुर आईटीआई का सच
निजीकरण का यह मॉडल छात्रों के भले के लिए नहीं, बल्कि निजी संस्थाओं के मुनाफे का खेल बन चुका है। प्रदेश के 10 आईटीआई संस्थानों का संचालन 'परम फाउंडेशन' नाम की संस्था को सौंपा गया है। प्रति आईटीआई लगभग 3.5 करोड़ रुपये पाने के बावजूद यह फाउंडेशन अपना बुनियादी कर्तव्य निभाने में विफल रहा है।
मैं खुद धार की माटी का बेटा हूँ, इसलिए सरदारपुर आईटीआई की जमीनी हकीकत का जिक्र करना जरूरी समझता हूँ:
- कर्ज के बोझ तले छात्र: आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी बच्चों को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने के लिए बने इस आईटीआई में फीस इतनी बढ़ा दी गई है कि बच्चों को लोन (ऋण) लेकर पढ़ाई करनी पड़ रही है।
- संसाधनों का टोटा: मोटी फीस और सरकारी फंड के बावजूद आईटीआई में ट्रेनिंग का नामोनिशान नहीं है। छात्राओं को सिलाई सिखाने के लिए नई सिलाई मशीनें तक नहीं हैं।
- लैब और सॉफ्ट स्किल्स गायब: तकनीकी प्रैक्टिकल के लिए आवश्यक असेंबली लैब और आधुनिक सॉफ्ट स्किल्स ट्रेनिंग जैसी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह नदारद हैं।
मुख्यमंत्री जी को देने होंगे इन सवालों के जवाब
जब सरकारी संपत्ति और जनता का पैसा निजी हाथों में लुटाया जा रहा है, तो मुख्यमंत्री जी को इन सवालों के जवाब देने होंगे:
- जो संस्थान गरीबों को सस्ती शिक्षा देने के लिए बने थे, उन्हें निजी कंपनियों की तिजोरी भरने का साधन क्यों बनाया जा रहा है?
- करोड़ों रुपये का सरकारी बजट लेने के बाद भी प्राइवेट फाउंडेशन छात्रों को बेसिक प्रैक्टिकल और सुविधाएं क्यों नहीं दे पा रहे?
- लोन लेकर पढ़ाई करने को मजबूर आदिवासी और गरीब छात्रों के अनिश्चित भविष्य का जिम्मेदार कौन है?
निष्कर्ष: 'कौशल विनाश' की नीति रुकनी चाहिए
कौशल विकास के नाम पर आईटीआई का यह निजीकरण असल में 'कौशल विनाश' की नीति है। अगर सरकार वास्तव में युवाओं का भविष्य संवारना चाहती है, तो उसे शिक्षा का बाज़ारीकरण तुरंत रोकना होगा। सरकारी आईटीआई को निजी हाथों से वापस लेकर उनमें पारदर्शी व्यवस्था, आधुनिक लैब और मुफ़्त/सस्ती गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बहाल करनी होगी, वरना एमपी का युवा इस बेरुखी को कभी माफ नहीं करेगा।