शिक्षकों के भविष्य से खिलवाड़ करती मोहन सरकार
शिक्षक सड़क पर, जिम्मेदार कौन?
मध्य प्रदेश में शिक्षक आज सड़क पर उतरने को मजबूर हैं, और इसकी पूरी जिम्मेदारी भाजपा सरकार की नीयत और नाकामी पर जाती है। करीब डेढ़ लाख सरकारी शिक्षकों का भविष्य शिक्षक पात्रता परीक्षा के जाल में उलझा दिया गया है, और सरकार महीनों से इस मसले पर सिर्फ टालमटोल करती आई है। नतीजा यह है कि अब शिक्षक संगठनों ने भोपाल के नीलम पार्क में अनिश्चितकालीन धरना-अनशन का ऐलान कर दिया है।
यह आंदोलन शिक्षकों की जिद नहीं है, बल्कि सरकार की उदासीनता का परिणाम है।
फाइलों में अटका भविष्य
जो शिक्षक वर्षों से कक्षाओं में बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं, आज उन्हीं का भविष्य सरकार की फाइलों में अटका गया है। पांच साल से कम सेवा वाले शिक्षकों को सेवानिवृत्ति तक सेवा जारी रखने की जो राहत दी गई, वह भी अधूरी और भ्रम पैदा करने वाली है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है, तो सरकार समयबद्ध और पारदर्शी समाधान निकालने के बजाय शिक्षकों को अनिश्चितता में क्यों धकेल रही है? क्या यही है भाजपा सरकार का शिक्षा और शिक्षकों के प्रति सम्मान?
शिक्षा व्यवस्था सरकारी उपेक्षा की शिकार
मैं यह बात दोहराना चाहता हूं कि मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था सरकारी उपेक्षा की शिकार है। खाली पड़े शिक्षकों के हजारों पद, अतिथि शिक्षकों का शोषण, और अब टीईटी जैसे मुद्दों पर स्पष्ट नीति का अभाव — यह सब मिलकर बताते हैं कि सरकार की प्राथमिकता में शिक्षक और शिक्षा कहीं नहीं है। जो सरकार बड़े-बड़े विज्ञापनों में "शिक्षा के मंदिर" बनाने का दावा करती है, वही सरकार अपने शिक्षकों को उनके वाजिब हक के लिए सड़क पर धरना देने पर मजबूर कर रही है। यह दोहरा चरित्र जनता समझने लगी है।
25 सितंबर की समयसीमा, अब आगे क्या?
शिक्षक संगठनों ने सरकार को 25 सितंबर तक की समयसीमा दी थी। अब सवाल यह है कि क्या सरकार अंतिम क्षण में कोई ठोस कदम उठाएगी, या फिर पहले की तरह इस बार भी सिर्फ आश्वासनों से काम चलाने की कोशिश करेगी?
मध्य प्रदेश के शिक्षकों ने बार-बार धैर्य दिखाया है, लेकिन धैर्य की भी एक सीमा होती है। जब वर्षों की मेहनत के बाद भी नौकरी की सुरक्षा और नियमितीकरण जैसे बुनियादी हक के लिए अनशन करना पड़े, तो यह पूरे सिस्टम की नाकामी है।
कांग्रेस की मांग: तुरंत बातचीत, स्पष्ट नीति
मैं मध्य प्रदेश सरकार से मांग करता हूं कि वह तत्काल शिक्षक संगठनों से मुद्दे पर बातचीत करे, अदालती आदेशों का सम्मान करते हुए स्पष्ट और शिक्षक-हितैषी नीति बनाए, और किसी भी शिक्षक को अनिश्चितकाल तक असमंजस में न रखे। यदि सरकार नहीं जागी, तो यह आंदोलन सिर्फ शिक्षकों तक सीमित नहीं रहेगा, यह पूरे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ जनआक्रोश का रूप ले सकता है। इसकी जवाबदेही अंततः सरकार को लेना ही होगी।
कांग्रेस पार्टी शिक्षकों के इस न्यायसंगत संघर्ष के साथ खड़ी है, और हम विधानसभा से लेकर सड़क तक उनकी आवाज बुलंद करते रहेंगे।