20 करोड़ की MRI और 46 करोड़ की लिनैक मशीनें शो-पीस, निजी अस्पतालों के भरोसे कैंसर और गंभीर मरीज
दो दशक का शासन, फिर भी बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था
मध्य प्रदेश में पिछले दो दशकों से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। सरकार द्वारा प्रदेश में बेहतर और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल की हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। राज्य के प्रमुख सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में करोड़ों रुपये की आधुनिक मशीनें या तो छोटे-मोटे उपकरणों के अभाव में शो-पीस बनी हुई हैं या तकनीकी स्वीकृतियों के फेर में अटकी पड़ी हैं। इसका सीधा खामियाजा प्रदेश के गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
हाल ही में प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे की बदहाली को उजागर करती दो प्रमुख खबरें सामने आई हैं:
20 करोड़ की MRI मशीनें मौजूद, पर मामूली मॉनिटर और सिरिंज पंप गायब
भोपाल, इंदौर, जबलपुर और रीवा जैसे बड़े शहरों के मेडिकल कॉलेजों में लगभग 20-20 करोड़ रुपये की लागत वाली अत्याधुनिक MRI मशीनें स्थापित की जा चुकी हैं। हालांकि, इन मशीनों के साथ इस्तेमाल होने वाले आवश्यक विशेष वर्कस्टेशन मॉनिटर और सिरिंज पंप उपलब्ध नहीं कराए गए हैं, जिनकी कीमत मशीन की तुलना में बेहद कम है।
- क्यों जरूरी हैं ये उपकरण? MRI के उच्च चुंबकीय क्षेत्र में सामान्य मॉनिटर काम नहीं करते। छोटे बच्चों, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों की MRI करते समय उन्हें बेहोश (एनेस्थीसिया) करना पड़ता है, जिसके लिए मरीज की हार्ट बीट और ब्लड प्रेशर पर लगातार नजर रखने हेतु यह मॉनिटर और सिरिंज पंप अनिवार्य होते हैं।
- निजी सेंटरों में लूट: इन मामूली उपकरणों की अनुपस्थिति के कारण सरकारी अस्पतालों में गंभीर मरीजों की MRI जांच नहीं हो पा रही है। जो जांच सरकारी अस्पताल में 1,000 से 12,000 रुपये के भीतर संभव थी, उसी के लिए मरीजों को मजबूरी में निजी स्कैनिंग सेंटरों में 20,000 रुपये तक की मोटी रकम चुकानी पड़ रही है।
हर साल 80 हजार नए कैंसर मरीज, 46 करोड़ की 'लिनैक मशीन' के लिए 4 साल से इंतजार
मध्य प्रदेश में कैंसर का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में हर साल लगभग 80,000 नए कैंसर मरीज सामने आ रहे हैं। कैंसर के सटीक और आधुनिक इलाज (रेडिएशन थेरेपी) के लिए लिनैक (Linear Accelerator) मशीन जीवनरेखा मानी जाती है।
- 4 साल से जारी प्रक्रिया: 46 करोड़ रुपये से अधिक कीमत की इन मशीनों को लगाने की प्रक्रिया 4 साल पहले शुरू हुई थी, जो आज तक पूरी नहीं हो पाई है।
- ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर और रीवा: इन शहरों के मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में मशीनें पहुंच तो गई हैं, लेकिन तकनीकी जांच और सुरक्षा प्रमाणपत्रों की सुस्ती के कारण इन्हें पूरी तरह शुरू होने में अभी कई महीनों का समय लग सकता है।
- भोपाल (GMC) का हाल: राजधानी के प्रतिष्ठित गांधी मेडिकल कॉलेज में लिनैक मशीन स्थापित करने के लिए 'बंकर' बनकर तैयार है, लेकिन मशीन अब तक अस्पताल नहीं पहुंची है।
निजी अस्पतालों के भरोसे गरीब जनता
कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का इलाज समय पर न मिलने से मरीजों की जान जोखिम में पड़ रही है। जो मरीज अपनी जमीन-जायदाद बेचकर निजी अस्पतालों में इलाज करा पा रहे हैं, वे आर्थिक रूप से कंगाल हो रहे हैं, जबकि गरीब परिवार सही समय पर इलाज न मिलने के कारण दम तोड़ने को मजबूर हैं।
सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल
जब प्रदेश के चार बड़े मेडिकल कॉलेजों का यह हाल है, तो छोटे जिलों और ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और स्वास्थ्य मंत्री/उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल की प्राथमिकताओं पर अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर स्वास्थ्य बजट का एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद मरीजों को बुनियादी सुविधाएं समय पर क्यों नहीं मिल पा रही हैं?