आभार राहुल जी: एक अन्याय के खिलाफ एक शाम की दास्तान
दिल दिमाग पर छा जाने वाली शाम
कुछ शामें कार्यक्रम की जगह दिल दिमाग़ पर याद बनकर छा जाती हैं। इंदौर में 19 सितंबर की शाम ऐसी ही एक शाम थी।
कई हफ़्तों की उलझनों, तैयारियों, नेहरू स्टेडियम की अनुमति न मिलने, फिर जगह बदलने और तारीख़ आगे बढ़ने के बाद इंदौर के उस मैदान में पहुँचा, तो सामने भीड़ नहीं, वे युवा चेहरे थे जिनके पास सरकार से संघर्ष करने का जज्बा था और कुछ नया करने की उम्मीद थी।
उन युवा चेहरों के सामने खड़े होकर मुझे एक ही ख़याल आया कि इन सबकी बात सुनने के लिए राहुल जी हैं। हमारा संबल राहुल जी हैं।
"सर, हम सिस्टम से हार गए"
मंच पर एक छात्र ने कहा, "सर, हम सिस्टम से हार गए।" ये शब्द मेरे कानों में गूँजते रहे। उस वाक्य में कई महीनों की हताशा थी, रात-रात भर की पढ़ाई और चारों तरफ फैले भ्रष्टाचार के बीच बचा हुआ भरोसा था, थोड़ी सी उम्मीद थी। यहाँ सबसे बड़ी बात यह थी कि उस छात्र को यह कहने की जगह मिली, और राहुल जी ने उसे ध्यान से सुना।
मनावर से आई पीड़ा, रायसेन का सन्नाटा
धार जिले के मनावर से आए एक युवक ने अपनी बात रखी, अपनी तकलीफ़ बताई। सामने से जो जवाब मिला, वह इतना सहज और अपनापन भरा था कि पूरा मैदान मुस्कुरा उठा। रायसेन के सूरज ठाकुर ने आदिवासी समाज की पीड़ा रखी तो मैदान में सन्नाटा छा गया। मैंने महसूस किया कि इन युवाओं को इस मंच से यह एहसास मिला कि वे अकेले नहीं हैं। इसीलिए आज मैं शुक्रिया कहना चाहता हूँ।
शुक्रिया राहुल जी
शुक्रिया राहुल जी, कि आप उस सिलसिले को कोटा से शुरू करके देहरादून, प्रयागराज और पुणे होते हुए इंदौर तक ले आए। शुक्रिया कि आपने बारिश, भीड़ और समय की परवाह किए बिना छात्रों को सुना। शुक्रिया कि आपने साबित किया कि सुनना भी नेता होने का हिस्सा है, जितना बोलना।
कार्यकर्ताओं और माँ-बाप का शुक्रिया
शुक्रिया उन कार्यकर्ताओं का, जिन्होंने तमाम रुकावटों और दुष्प्रचार के बीच रात-दिन एक कर दिया। उन्होंने यह सोचा कि प्रदेश के बच्चों की बात सबको पता होना चाहिए। और शुक्रिया उन माँ-बाप का, जिन्होंने अपने बच्चों को आने दिया, यह जानते हुए भी कि यह सरकार उनके बच्चों पर कभी भी लाठियाँ बरसा सकती है।
राजनीति में भावना की जगह
कहते हैं राजनीति में भावनाओं की जगह नहीं होती। मैं कहता हूँ, जिस राजनीति में आँसू, उम्मीद और भरोसे की जगह नहीं, वह राजनीति नहीं है। मैंने उस शाम देखा कि जब राजनीति किसी की तकलीफ सुनती है तो उसमें भावना अपने आप लौट आती है।
सड़क से विधानसभा तक का वादा
आज मैं वादा करता हूँ कि इस गूंज को केवल एक कार्यक्रम की याद बनकर नहीं रहने दूँगा। जो सवाल मंच से उठे, उन्हें सड़क से लेकर विधानसभा तक ले जाऊँगा। यही हमारी ओर से राहुल जी और प्रदेश के हर युवा के प्रति सच्चा आभार होगा।