"मैं भी इंसान हूं" — किन्नर समुदाय की अनकही पीड़ा
समाज की उपेक्षा का सामना करता किन्नर समुदाय
समाज में आज भी "किन्नर" नाम को धब्बा समझा जाता है। लोग उन्हें देखकर सवाल करते हैं, दूरी बनाते हैं, ताने मारते हैं — लेकिन कोई यह नहीं समझता कि वो भी इसी समाज का हिस्सा हैं, वो भी इंसान हैं। सरकार की योजनाएँ हर वर्ग के लिए बनती हैं, लेकिन किन्नर समुदाय आज भी उनके बाहर खड़ा है — न नौकरी, न अवसर, न सम्मान।
'जन-पक्ष' पॉडकास्ट में देवी रानी जी से रूबरू
अपने पॉडकास्ट 'जन-पक्ष' के हालिया एपिसोड में मुझे देवी रानी जी से रूबरू होने का मौका मिला। उन्होंने जो आपबीती साझा की, वह अकेले उनकी नहीं, बल्कि हज़ारों किन्नरों की कहानी है, और उसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।
देवी रानी जी ने बताया कि वे एक ठाकुर परिवार से आती हैं, लेकिन अपनी पहचान की वजह से परिवार से अलग कर दी गईं — यह अकेलापन किसी एक दिन की घटना नहीं, बल्कि बरसों की सामाजिक अस्वीकृति का नतीजा है।
शादी से जुड़ा विवाद: निजी मसला बना सामाजिक कलंक
बातचीत में शादी से जुड़ा एक विवाद भी सामने आया, जहां रिश्तेदारों के बीच यह सवाल तक उठा कि असल रिश्ता किससे हुआ। जब यह बात ससुराल पक्ष तक पहुंची, तो "लोग क्या कहेंगे" के डर ने मामले को इतना बड़ा बना दिया कि वह महिला थाने तक जा पहुंचा — एक निजी पारिवारिक मसला भी सामाजिक कलंक और कानूनी उलझन में बदल गया, सिर्फ इसलिए क्योंकि इसमें एक किन्नर व्यक्ति शामिल थी।
आस्था नहीं डिगी, दर्द फिर भी सार्वजनिक नहीं
सबसे मार्मिक पल तब आया जब उन्होंने कहा कि उन्हें बहुत सी ऐसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जिन्हें वे सार्वजनिक भी नहीं करना चाहतीं। समाज पीड़ा देता भी है, और पीड़ा बताने की जगह भी नहीं छोड़ता। फिर भी उनकी आस्था नहीं डिगी — "ऊपर वाले को मंज़ूर होता तो कितना भी छुपा लो, नहीं छुपती।"
समाज परिवार छुपाने की कोशिश करता है लेकिन कहीं न कहीं बात खुलती ही है।
"इन्हें भी जन्म मिला है, तो इनका भी अधिकार है"
बातचीत के एक अहम मोड़ पर मैंने खुद यह बात कही — जन्म के आधार पर मिलने वाला अधिकार किसी की शारीरिक पहचान से कम नहीं हो सकता, फिर किन्नर समुदाय को शिक्षा, रोज़गार और सम्मान से वंचित क्यों रखा जाता है?
नौकरी और रोज़गार की बात उठते ही देवी रानी जी ने साफ कहा कि किन्नर समुदाय को अवसर मिलने के बजाय हमेशा दरकिनार कर दिया जाता है।
समाज का दोहरा रवैया
उन्होंने समाज के दोहरे रवैये को भी उजागर किया — लोग सिर्फ यह देखते हैं कि "किन्नर समाज बदतमीज़ी कर रहा है", लेकिन वह अपमान, बहिष्कार और असुरक्षा कभी नहीं देखते, जो उन्हें रोज़ ऐसे बर्ताव के लिए मजबूर करती है।
रामायण का संदर्भ: परंपरा में सम्मान, समाज में उपेक्षा
धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ में भी उन्होंने अपनी बात मज़बूती से रखी — रामायण की उस कथा का हवाला देते हुए, जिसमें भगवान राम ने वनवास से लौटते समय किन्नर समुदाय को आशीर्वाद दिया था। यानी जिस समुदाय को आज हाशिये पर रखा जाता है, उसे स्वयं भारतीय आस्था और परंपरा में सम्मान प्राप्त है — फिर आधुनिक समाज इस विरासत को क्यों भूल गया?
व्यवस्था की समस्या, व्यक्तिगत नहीं
इस बातचीत में मैंने साफ कहा कि मेरा मकसद किसी एक व्यक्ति की मदद नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए काम करना है — "मुझे पूरे समाज के लिए प्रयास करना है, समाज सेवा करना है, कोई व्यक्तिगत बात नहीं।" यह रुख़ ज़रूरी भी है, क्योंकि किन्नर समुदाय की समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, एक पूरी व्यवस्था की बनाई हुई है।
अनुत्तरित सवाल
सरकारी योजनाओं का लाभ किन्नर समुदाय तक वाकई पहुंचता है, या सिर्फ कागज़ों तक सीमित है? रोज़गार और शिक्षा में उन्हें बराबरी का मौका कब मिलेगा? परिवार और समाज उन्हें कब "अपना" मानेंगे, न कि सिर्फ सहानुभूति का पात्र? कानून और पुलिस व्यवस्था उनके पारिवारिक-वैवाहिक मामलों में कितनी संवेदनशील है?
दया नहीं, अधिकार चाहिए
किन्नर समुदाय को दया नहीं, अधिकार चाहिए। सम्मान की भीख नहीं, बराबरी की जगह चाहिए। जब तक हम उन्हें सिर्फ "अलग" है वाली नजर से देखना बंद कर "अपना" मानना शुरू नहीं करेंगे, तब तक यह लड़ाई अधूरी रहेगी।
मेरा प्रयास है कोई भी अपने अधिकारों, सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा से वंचित न रहे। मैं इस दिशा में अपनी तरफ़ से आगे भी हर संभव प्रयास जारी रखूंगा।