आदिवासियों के घर उजाड़कर भाजपा किसका विकास करती है?
कोसमी गांव के आदिवासी परिवारों का दर्द
मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने का मामला बेहद गंभीर है। अपने घर और जीवनभर की जमा-पूंजी गंवाने वाले आदिवासी परिवार आज न्याय की मांग लेकर भोपाल पहुंच रहे हैं। वे मुआवजा, पुनर्वास और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई चाहते हैं। सवाल यह है कि आखिर इन परिवारों की यह हालत क्यों हुई और अब तक उन्हें न्याय दिलाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं?
प्रदेश की भाजपा सरकार आदिवासियों के हितों की बात करती है। बड़े-बड़े मंचों से उनके अधिकारों और कल्याण की घोषणाएं की जाती हैं। लेकिन जब आदिवासी परिवारों के सिर से छत छिन जाती है, तब सरकार की नीतियों और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आदिवासियों के घर उजाड़कर विकास का दावा कैसे किया जा सकता है?
कानून के नाम पर गरीबों को बेघर करती सरकार
कोसमी गांव में वन भूमि से कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े गए। इस कार्रवाई में फसलों और अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुंचने की खबरें भी सामने आई हैं।
मैं मानता हूं कि कानून का पालन होना चाहिए और वन भूमि की रक्षा भी जरूरी है। लेकिन कानून लागू करने के नाम पर किसी परिवार की आजीविका और जीवन को संकट में डालने से जुड़े सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सरकार बताए कि क्या संबंधित परिवारों को उचित सूचना दी गई थी? क्या उनके भूमि संबंधी दस्तावेजों और वन अधिकारों से जुड़े दावों की जांच की गई थी? क्या उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर मिला? यदि मकान और फसलें नष्ट हुई हैं, तो नुकसान का आकलन कौन करेगा?
किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई की वैधानिकता और उसके तरीके की जांच होनी चाहिए। यदि प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
सरकार की जिम्मेदारी केवल कार्रवाई करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी नागरिक के साथ अन्याय न हो।
शिवराज सिंह चौहान की नाराजगी ने बढ़ाए सवाल
इस मामले में केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी अधिकारियों की कार्रवाई पर नाराजगी जताई है। उन्होंने प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप किया। इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ इस विषय पर चर्चा भी हुई।
जब सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ नेता को भी प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाने पड़ रहे हैं, तो यह जानना जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर शिकायतों का समाधान करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
मैं सरकार से पूछना चाहता हूं कि यदि प्रशासन ने नियमानुसार कार्रवाई की थी, तो प्रभावित परिवारों की समस्याओं का समाधान अब तक क्यों नहीं हुआ? और यदि कार्रवाई में नियमों की अनदेखी हुई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कदम उठाए गए हैं?
इस मामले को भाजपा के भीतर के मतभेदों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण वे आदिवासी परिवार हैं, जिनके घर और आजीविका प्रभावित हुए हैं। उन्हें न्याय दिलाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
आदिवासियों के अधिकारों पर सरकार की चुप्पी
मध्यप्रदेश में आदिवासी समाज की जमीन, जंगल, रोजगार और आजीविका से जुड़े सवाल लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। आदिवासी समुदाय के अधिकारों की रक्षा करना सरकार की संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है।
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि कोसमी गांव के प्रभावित परिवारों की भूमि की स्थिति क्या है। क्या उनके वन अधिकारों से संबंधित दावों की जांच हुई थी? क्या कार्रवाई से पहले सभी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया? जिन परिवारों को नुकसान पहुंचा है, उनकी मदद के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
आदिवासी परिवारों को अपने अधिकारों के लिए बार-बार भटकना पड़े, यह स्थिति किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।
आदिवासी समाज को केवल योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं देखा जा सकता। उनके अधिकारों, सम्मान, आजीविका और सुरक्षित जीवन की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है।
सरकार केवल जांच का भरोसा न दे, कार्रवाई करे
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मामले में न्याय का भरोसा दिया है। अब सरकार को इस भरोसे को ठोस कार्रवाई में बदलना चाहिए।
मैं मांग करता हूं कि:
- पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जांच की समयसीमा तय की जाए।
- मकानों, फसलों और अन्य संपत्तियों को हुए नुकसान का आकलन कराया जाए।
- प्रभावित परिवारों को नियमानुसार मुआवजा और पुनर्वास की सुविधा दी जाए।
- भूमि और वन अधिकारों से जुड़े सभी दावों की उचित जांच की जाए।
- यदि किसी अधिकारी ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसकी जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाए।
- प्रभावित परिवारों को जांच और कार्रवाई की प्रगति की जानकारी दी जाए।
अब जरूरी यह है कि जांच पूरी हो, तथ्य सामने आएं और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो। प्रभावित परिवारों को राहत मिलने में देरी नहीं होनी चाहिए।
भाजपा का विकास गरीबों को बेघर करना है
वन भूमि की रक्षा करना जरूरी है। पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखना भी हमारी जिम्मेदारी है। लेकिन इन उद्देश्यों को पूरा करते समय कानून, उचित प्रक्रिया और प्रभावित लोगों के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
सरकार को भूमि की स्थिति, कार्रवाई के कानूनी आधार और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास से जुड़े सवालों पर स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। यदि कार्रवाई नियमानुसार हुई है, तो उससे संबंधित तथ्य सार्वजनिक किए जाएं। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदारी तय की जाए।
विकास की सफलता केवल इससे नहीं मापी जा सकती कि कितनी जमीन खाली कराई गई। यह भी देखना होगा कि विकास और प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान गरीबों, आदिवासियों और कमजोर वर्गों के अधिकार कितनी गंभीरता से सुरक्षित रखे गए।
मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि आदिवासी समाज को आश्वासन नहीं, न्याय चाहिए। जिन परिवारों के घर टूटे हैं, उन्हें अपने भविष्य की चिंता है। उन्हें यह भरोसा मिलना चाहिए कि सरकार उनके साथ खड़ी है और उनकी समस्याओं का समाधान करेगी।
कोसमी के परिवारों को राहत मिले, नुकसान का आकलन हो और प्रशासन की जवाबदेही तय हो। यही इस मामले में सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
आदिवासियों के हितों की रक्षा घोषणाओं से नहीं होती। इसकी असली परीक्षा तब होती है, जब किसी आदिवासी परिवार को न्याय की जरूरत होती है।
सरकार को इस परीक्षा में जवाब देना होगा।