दिल्ली की नाकेबंदी और तानाशाही, विपक्ष के डर से कांपती केंद्र सरकार का सच!
सरकार का डर हुआ बेनकाब
दिल्ली की तानाशाह सरकार का डर और घबराहट आज पूरे देश के सामने बेनकाब हो चुकी है। आज जो कुछ राजधानी दिल्ली में हो रहा है, उसने साबित कर दिया है कि केंद्र में बैठी सत्ता अब जनता के जनादेश से नहीं, बल्कि डर और तानाशाही के सहारे टिकी है। दिल्ली की सीमाओं को पूरी तरह सील कर देना, राजधानी की तरफ जाने वाली सभी ट्रेनों को बीच रास्ते में रोक देना, और उन ट्रेनों से चुन-चुनकर नौजवानों व युवाओं को उतार देना, यह किस बात का प्रतीक है? क्या यह एक लोकतांत्रिक देश की तस्वीर है या फिर किसी अघोषित आपातकाल की?
मेट्रो बंद, जंतर-मंतर पर कटीली बाड़
मेट्रो सेवाएं बंद करके और जंतर-मंतर की ओर जाने वाले तमाम रास्तों पर लोहे की कटीली बाड़ें और बैरिकेड्स खड़े करके मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि वह विपक्ष की आवाज से, नौजवानों के आक्रोश से और देश के लोकतंत्र को बचाने की हुंकार से किस कदर कांप रही है। आखिर यह पूरी सुरक्षा घेराबंदी और यह तमाशा किसलिए किया गया? सिर्फ इसलिए कि देश का विपक्ष जंतर-मंतर पर इकट्ठा होकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सवाल न पूछ सके, उनके कारनामों के खिलाफ एक शांतिपूर्ण आंदोलन न खड़ा कर सके।
ज्ञानेश कुमार को बचाने में जुटी सरकार
पूरी केंद्र सरकार और उसकी पूरी मशीनरी आज एक अकेला काम करने में जुटी है: ज्ञानेश कुमार को बचाने में। वही ज्ञानेश कुमार, जिन पर चुनाव प्रक्रियाओं की निष्पक्षता को ताक पर रखकर, जनमत से खिलवाड़ करने और संस्थागत निष्पक्षता की धज्जियां उड़ाने के संगीन आरोप हैं। जिस संस्था पर देश के लोकतंत्र की निष्पक्षता की जिम्मेदारी थी, उसी के शीर्ष पर बैठकर लोकतंत्र के साथ जो खिलवाड़ हुआ, उसने देश के कई राज्यों में जनता के असली जनादेश को छला है। आज जब जनता और विपक्ष मिलकर इस संस्थागत धांधली का हिसाब मांग रहे हैं, तो सरकार जनता का सामना करने के बजाय ज्ञानेश कुमार को ढाल बनाकर खड़ी हो गई है।
सरकार का खौफ ही हमारी जीत
लेकिन, मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि सरकार का यह खौफ ही हमारी और देश के लोकतांत्रिक आंदोलन की सबसे बड़ी जीत है। आज केंद्र सरकार की इस दमनकारी कार्रवाई ने खुद अपने मुंह से कबूल कर लिया है कि उसकी बुनियाद कितनी खोखली है। जो सरकार जनता के समर्थन से चलने का दावा करती है, उसे जंतर-मंतर पर कुछ घंटे के शांतिपूर्ण प्रदर्शन से इतना डर क्यों लग रहा है?
सरकार को सबसे बड़ा खौफ इस बात का है कि कहीं ज्ञानेश कुमार का मुंह न खुल जाए, कहीं उस सांठगांठ की पोल न खुल जाए जिसके दम पर लोकतंत्र का गला घोंटा गया है। सरकार जानती है कि अगर सच सामने आया, तो उनके झूठे दावों की पूरी इमारत पलभर में ढह जाएगी।
दिल्ली बनी छावनी, युवाओं को ट्रेनों से उतारा गया
एक तरफ हमारे देश का नौजवान रोजगार और अपने भविष्य की सुरक्षा मांग रहा है, दूसरी तरफ विपक्ष लोकतंत्र की बहाली और चुनाव प्रणाली की पवित्रता की लड़ाई लड़ रहा है। लेकिन इस आवाज को सुनने के बजाय युवाओं को ट्रेनों से घसीटकर उतारा जा रहा है, रास्तों को बंद किया जा रहा है और दिल्ली को एक छावनी में बदल दिया गया है। तानाशाही की एक तय सीमा होती है, और जब जुल्म हद से गुजरता है, तो क्रांति का जन्म होता है।
यह लड़ाई हर नागरिक के वोट की है
मध्य प्रदेश की जनता और देश का हर जागरूक नागरिक आज इस तमाशे को देख रहा है। हम डरने वाले नहीं हैं। दिल्ली की सड़कों पर बिछाए गए बैरिकेड्स और सील की गई सीमाएं हमारी आवाज को नहीं दबा सकतीं। ज्ञानेश कुमार जैसे अधिकारियों को बचाकर सरकार थोड़े समय के लिए सच को छुपा सकती है, लेकिन जनता की अदालत से नहीं बच सकती।
यह लड़ाई किसी एक दल की नहीं, बल्कि देश के संविधान, लोकतंत्र और हर नागरिक के वोट के अधिकार की रक्षा की लड़ाई है, और यह लड़ाई हर कीमत पर आगे बढ़ेगी।