डिजिटल इंडिया के नाम पर आम आदमी की जेब पर एक और बोझ
यह सरकार का नीतिगत यू-टर्न है। पहले लोगों को नकद छोड़कर डिजिटल भुगतान की आदत डलवाई गई, बैंकिंग व्यवस्था को कैशलेस बनाने का सपना दिखाया गया, और अब जब लोग उस आदत में ढल चुके हैं, तब चुपचाप उनकी जेब पर चार्ज थोपे जा रहे हैं।
यूपीआई के जरिए फिर देश को ठगने की तैयारी
भाजपा ने यूपीआई के माध्यम से देश को दोबारा ठगना शुरू कर दिया है। देश में यूपीआई ने पिछले कुछ वर्षों में लेन-देन का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। सब्जी वाले से लेकर बड़े शोरूम तक, हर जगह "यूपीआई से भेज दो, क्यू आर कोड दे दो, डाल दूंगा" सुनने को मिलता है। लेकिन अब 15 अक्टूबर से पेट्रोल पंपों, बीमा, टेलीकॉम और यूटिलिटी बिल जैसी सेवाओं पर 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर प्रति लेन-देन 5 रुपये का शुल्क तय किया गया है।
सुनने में यह रकम छोटी लगती है, मगर इसके पीछे छिपी नीयत और इसका असर बहुत बड़ा है।
"ग्राहक नहीं देगा" का खोखला तर्क
सरकार और एनपीसीआई बार-बार यह कहकर संतोष देने की कोशिश कर रहे हैं कि आम ग्राहक को पेट्रोल भरवाने के लिए यूपीआई से भुगतान करने पर कोई सीधा चार्ज नहीं देना होगा, यह बोझ पेट्रोल पंप संचालकों पर पड़ेगा। लेकिन यह तर्क उतना ही खोखला है जितना हर बार जीएसटी बढ़ने पर "व्यापारी देगा, ग्राहक नहीं" कहना।
हकीकत यह है कि कोई भी व्यापारी नुकसान नहीं उठाता। पेट्रोल पंप डीलर पहले ही कमीशन कम मिलने की शिकायत करते रहे हैं और अब इस नए शुल्क को लेकर उन्होंने सरकार से राहत की मांग की है। जब लागत बढ़ेगी, तो देर-सवेर वह किसी न किसी रूप में ग्राहक तक ज़रूर पहुंचेगी — चाहे पेट्रोल के दाम में एक फुसफुसाता सा इज़ाफा हो या सेवा की गुणवत्ता में कटौती।
आज पांच रुपये, कल दस — यह सिर्फ शुरुआत है
असली चिंता की बात यह है कि यह सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित मुद्दा नहीं है। यह शुरुआत है। आज पांच रुपये है, कल दस होगा, परसों यह दायरा और सेवाओं तक फैल जाएगा। जिस देश ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए वर्षों तक "जीरो एमडीआर" की नीति अपनाई, अब उसी नीति में छेद किए जा रहे हैं।
यह सरकार का नीतिगत यू-टर्न है। पहले लोगों को नकद छोड़कर डिजिटल भुगतान की आदत डलवाई गई, बैंकिंग व्यवस्था को कैशलेस बनाने का सपना दिखाया गया, और अब जब लोग उस आदत में ढल चुके हैं, तब चुपचाप उनकी जेब पर चार्ज थोपे जा रहे हैं।
नकद की तरफ लौटने का खतरा
इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि व्यापारी वर्ग, खासकर छोटे पेट्रोल पंप संचालक और दुकानदार, फिर से नकद लेन-देन की तरफ लौटने को मजबूर हो सकते हैं। हर डिजिटल लेन-देन पर कोई न कोई कटौती होगी, तो स्वाभाविक है कि व्यापारी ग्राहकों को नकद भुगतान के लिए प्रोत्साहित करेंगे। इससे न सिर्फ डिजिटल इंडिया का सपना कमजोर पड़ेगा, बल्कि टैक्स चोरी और काले धन के रास्ते खुलने का डर भी बढ़ेगा। जिस पारदर्शिता की बात करके यूपीआई को बढ़ावा दिया गया था, वही पारदर्शिता जनता की जेब पर भारी पड़ने लगी है।
हर रास्ते पर जेब से कटौती
यह सिर्फ यूपीआई की बात नहीं है। एटीएम से पैसा निकालने पर पहले से तय सीमा के बाद चार्ज लगता है, बैंक खाते में न्यूनतम बैलेंस न रखने पर जुर्माना लगता है, चेक बुक और एसएमएस अलर्ट तक पर शुल्क वसूला जाता है। अब यूपीआई पर भी भरम फैलाकर चार्ज जोड़ा जा रहा है। मतलब आम आदमी चाहे नकद रखे या डिजिटल भुगतान करे, हर रास्ते पर उसकी जेब से कुछ न कुछ काटा जा रहा है।
यह किस तरह का वित्तीय समावेशन है, जहां "मुफ्त" के नाम पर परोसी गई सुविधा जेब काटती नजर आने लगी है।
मध्यमवर्गीय परिवार पर सबसे बड़ी मार
सबसे ज्यादा मार मध्यमवर्गीय परिवार पर पड़ेगी। जो नौकरीपेशा व्यक्ति महीने भर पेट्रोल, बीमा प्रीमियम, बिजली-पानी का बिल यूपीआई से चुकाता है, उसके लिए यह छोटे-छोटे शुल्क मिलाकर सालाना एक अच्छी-खासी रकम बन जाएंगे। और जब महंगाई पहले से ही घर का बजट बिगाड़े हुए है, तब यह अतिरिक्त बोझ किसी तमाचे से कम नहीं।
मध्यमवर्गीय जनता के पास फिलहाल दो ही रास्ते बचते हैं — या तो वह अपने भुगतान को 2,000 रुपये की सीमा के भीतर बांटकर करे, ताकि शुल्क से बचा जा सके, या फिर जागरूक होकर इस नीति के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाए।
भरोसा टूटा तो डिजिटल क्रांति भी बिखर सकती है
सरकार को समझना होगा कि डिजिटल भारत का सपना तभी सफल होगा जब आम आदमी को उस पर भरोसा हो, न कि जब हर लेन-देन पर उसे शक होने लगे कि आज कितना कटेगा। जनता की जेब से एक-एक रुपया निकालने से पहले नीति-निर्माताओं को यह सोचना चाहिए कि भरोसा टूटा तो डिजिटल क्रांति भी बिखर सकती है।
नए नियम से साफ हो रहा है भाजपा की करनी और कथनी में जमीन-आसमान का अंतर है। जनता का हित चाहती है तो उसे यूपीआई शुल्क वापस लेना चाहिए।