भाषणों में पूजा, रात में लाठियां: केन-बेतवा प्रोजेक्ट और पन्ना के आदिवासियों का दर्द
विकास की कीमत चुकाते आदिवासी
देश में विकास के बड़े-बड़े दावों और विज्ञापनों के बीच एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि जब-जब कोई बड़ी परियोजना आकार लेती है, उसकी सबसे बड़ी कीमत देश के मूल निवासी यानी आदिवासियों को चुकानी पड़ती है। केंद्र और राज्य की 'डबल इंजन' सरकारों के दौर में भाषणों के मंच से तो आदिवासियों को प्रकृति पूजक और आदरणीय कहकर सम्बोधित किया जाता है, लेकिन धरातल पर नीतियां उनके खिलाफ ही खड़ी नजर आती हैं।
ताजा और ज्वलंत उदाहरण मध्य प्रदेश के पन्ना जिले का है, जहाँ केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित हो रहे आदिवासी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन हक मांगने के बदले उन्हें क्या मिल रहा है?
सत्य, अहिंसा और चिता सत्याग्रह
केन-बेतवा परियोजना के कारण जिनका सब कुछ उजड़ने की कगार पर है, वे भोले-भाले आदिवासी किसी व्यक्ति या सरकार के खिलाफ हिंसा नहीं कर रहे। वे संविधान में विश्वास रखते हुए सत्य और अहिंसा के मार्ग पर 'जल सत्याग्रह' और 'चिता सत्याग्रह' कर रहे हैं।
हालात इतने डरावने हैं कि कोई सत्याग्रही जलती चिता के प्रतीकात्मक ढांचे पर लेटा है, कोई सूली के सामने खड़ा है, तो कइयों ने अपने हाथ-पैरों में बेड़ियां बांध रखी हैं। लगातार बारिश और पानी में खड़े रहने के कारण आदिवासियों के हाथ-पांव गलने लगे हैं और वे त्वचा रोगों की चपेट में हैं। लेकिन इस अमानवीय पीड़ा के बावजूद पन्ना में पुलिस प्रशासन का जो रवैया दिखा, उसने अंग्रेजी हुकूमत के दौर के दमन चक्र की याद दिला दी। निहत्थे सत्याग्रहियों और महिलाओं पर रात के अंधेरे में लाठियां बरसाना किस लोकतंत्र का हिस्सा है?
8 साल का इंतजार और भ्रष्टाचार का दंश
आदिवासियों ने यूं ही अपनी जान जोखिम में नहीं डाली है। इस विस्थापन की कहानी 8 साल पुरानी है:
- धारा 11 और अधूरा सर्वे: विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुए 8 साल से अधिक का समय बीत चुका है। सर्वे में इतनी खामियां हैं कि सैकड़ों प्रभावित परिवारों के नाम सूची से पूरी तरह गायब हैं।
- संपत्तियों का गलत मूल्यांकन: जिन लोगों के नाम सूची में हैं, उनकी जमीनों, मकानों और परिसंपत्तियों का सही आंकलन नहीं किया गया, जिससे उन्हें मिलने वाला मुआवजा बेहद मामूली है।
- मुआवजे में रिश्वतखोरी: जो थोड़ा-बहुत मुआवजा स्वीकृत भी हुआ है, उसे पाने के लिए गरीब आदिवासियों से रिश्वत मांगी जा रही है।
एक तरफ उजड़ता आशियाना, दूसरी तरफ सरकारी तंत्र का भ्रष्टाचार, ऐसे में इन आदिवासियों के पास कोई चारा कहाँ बचता है।
सरकार से तीन सीधे सवाल
गृह मंत्रालय का प्रभार संभालने वाले मुख्यमंत्री और प्रशासन को यह समझना होगा कि ये आदिवासी कोई अपराधी नहीं, बल्कि इस देश के सम्मानित नागरिक हैं जिन्होंने इस सरकार को चुना है।
- क्या लोकतांत्रिक देश में अपने हक के लिए आवाज उठाना गुनाह है?
- 8 साल बीत जाने के बाद भी विस्थापितों का पारदर्शी सर्वे और पुनर्वास क्यों नहीं हो सका?
- महिलाओं और बुजुर्गों पर रात के अंधेरे में बल प्रयोग करने वाले पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई कब होगी?
निष्पक्ष पुनर्वास ही एकमात्र समाधान
आदिवासी समाज सिर्फ वादों और भाषणों से पेट नहीं भर सकता। केन-बेतवा लिंक परियोजना के नाम पर आदिवासियों की बलि देना बंद होना चाहिए। सरकार को तुरंत दमनकारी नीति छोड़कर संवेदनशील रुख अपनाना होगा:
- पीड़ित आदिवासियों की सभी न्यायसंगत मांगों को स्वीकार किया जाए।
- परिसंपत्तियों का पुनः निष्पक्ष और पारदर्शी सर्वे कराया जाए।
- दोषी अधिकारियों और पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई कर भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जाए।
जब तक आदिवासियों को उनकी जल, जंगल और जमीन का वाजिब हक नहीं मिल जाता, तब तक विकास का कोई भी दावा अधूरा और असंवेदनशील ही कहलाएगा।